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दयाराम ठेठवार
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, रायगढ़, छत्तीसगढ़,

'ऐसी आज़ादी के लिए तो नहीं लड़े थे'

पहले जब हम पॉलिटिकल पार्टियों के लिए काम करते थे तो सरकारों से माँग करते थे कि रायगढ़ को भी एकाध उद्योग दे दिया जाए.

लेकिन सरकारें सुनती नहीं थीं.

फिर सरकार ने ऐसे उद्योग बख़्शे कि रायगढ़ में ही 40-45 स्पाँज आयरन उद्योग लग गए.

पहले यह शहर शांतिप्रिय शहर था लेकिन अब तो यह रहने लायक ही नहीं बचा.

एक तो शहर में बहुत प्रदूषण हो गया है, दूसरे बेकारी बहुत बढ़ी है और तीसरे राज्य नाम की कोई चीज़ नहीं बची है.

इतने उद्योगों के बाद बेकारी बढ़ना आश्चर्यजनक है लेकिन सच यही है कि उद्योगपति स्थानीय लोगों को रोज़गार नहीं दे रहे हैं. जिनकी ज़मीनें ली गईं उनको काम नहीं मिल रहा है.

सरकार कुछ करती नहीं. पता नहीं सरकार और इन फ़ैक्ट्रियों के प्रबंधन के बीच कोई साठगाँठ है या क्या है.

असर

इन उद्योगों का नुक़सान ज़्यादा दिखता है.

गर्मी बढ़ गई है. अब तो ठंड के दिनों में भी गर्मी बनी रहती है.

बरसात पहले की तरह बहुत होती है लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं. फ़ैक्ट्री से कोयले का धुँआ इतना है कि खेतों में जम जाता है. फसल ही नहीं होती.

यहाँ सीताफल (शरीफ़ा) की फसल बहुत होती थी लेकिन इस साल वह आया ही नहीं. अमरूद की फसल इस साल नहीं हुई. आम की फसल लगातार कम हो रही है.

कहने को हम समाजवादी राष्ट्र के नागरिक हैं, स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिक हैं. लेकिन अभी भी हमारे तमाम बंधु ग़रीबी में रह रहे हैं.

उनके पास आवास नहीं है, ज़मीनें नहीं हैं लेकिन सरकार भटकी हुई है.

उद्योगपतियों को पहाड़, जंगल, नदी, मरघट और गोचर सब कुछ दिया जा रहा है लेकिन ग़रीबों को घर बनाने के लिए भी ज़मीन नहीं मिल रही है.

हम पिछड़े ही होते जा रहे हैं.

आख़िर यही सब देखने के लिए तो आज़ादी की लड़ाई नहीं लड़ी थी. ऐसा लगता है कि इन लोगों को काट दें.

हम समाजवादी विचारधारा के हैं और पूँजीवादी व्यवस्था पसंद नहीं आती. लेकिन लगता है कि राज्य और केंद्र दोनों सरकारें पूँजीवादी व्यवस्था की ग़ुलाम हैं.

बस अब मैं और कुछ नहीं कहना चाहता.

(जैसा उन्होंने विनोद वर्मा को बताया)