शुक्रवार, 18 मई, 2007 को 12:27 GMT तक के समाचार
नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर
विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के श्रद्धासंगम के रूप में विख्यात अजमेर स्थित ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए ड्रेस कोड लागू करने पर विचार किया जा रहा है.
हालांकि दरगाह प्रबंधकों के इस प्रस्ताव पर ख़ादिमों की संस्था अंजुमन ने कहा है कि इसकी कोई जरूरत नहीं है क्योंकि श्रद्धालु पहले से ही मान्य लिबास का पालन कर रहे हैं.
दरगाह के नाज़िम अहमद रज़ा ने बीबीसी को बताया कि वे चाहते हैं कि श्रद्धालु इबादत के लिए आते समय लिबास का ध्यान रखें.
उनके मुताबिक अक़ीदतमंद पुरुष सिर पर टोपी या कपड़ा, बाँहें कोहनी तक ढक कर और टखने तक का लिबास पहन कर आएं.
महिलाओं के लिए सिर पर चुनरी या पल्लू और टखने तक सलवार या साड़ी पहनने की सलाह दी गई है.
दरगाह प्रबंधन ने इस संबंध में ख़ादिमों की संस्था अंजुमन को पत्र भेजकर सलाह माँगी है.
सदियों पुराने इस दरगाह में प्रबंधकों को यकायक इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई? इस सवाल के जवाब में अहमद रज़ा कहते हैं, '' पिछले साल अदाकारा कैटरीन कैफ़ एक फ़िल्म की शूटिंग के सिलसिले में दरगाह आईं तो उनके तंग लिबास पर काफ़ी विवाद उठ खड़ा हुआ.''
प्रस्ताव मंजूर नहीं
वे कहते हैं, ''प्रबंधन ने इस पर कैटरीना को नोटिस जारी किया और सेंसर बोर्ड की शिकायत की थी. हम चाहते हैं कि भविष्य में ऐसी स्थिति पैदा न हो.''
दरगाह प्रबंधन के मुताबिक अगर ख़ादिमों ने इस प्रस्ताव पर स्वीकृति दे दी तो दीवारों पर भी लिबास के बारे में लिखवा दिया जाएगा.
हालांकि अंजुमन ने इस प्रस्ताव को सिरे से ही ख़ारिज कर दिया है.
अंजुमन के प्रवक्ता सरवर चिश्ती कहते है,'' ज़ायरीन या श्रद्धालु सदियों से यहाँ आते रहे हैं और उन्हें मालूम होता है कि इस पवित्र दरगाह की क्या परंपरा है. कोई अनजाने में सिर ढककर न आए तो लोग या ख़ादिम उसे आगाह कर देते हैं. इस प्रस्ताव का कोई औचित्य नहीं है.''
अंजुमन के सचिव मोइन हुसैन चिश्ती कहते हैं,'' हर कोई यहाँ आस्था भाव से आता है. कोई अक़ीदतमंद भला बेअदबी की नीयत से क्यों आएगा.''
एस हसन चिश्ती भी कहते हैं, '' ये कोई शिक्षण संस्थान नहीं है, जहाँ ड्रेस कोड की दरकार हो.''
जाहिर है ये वो स्थान है जहाँ सैकड़ों सालों से राजा, रंक और फ़कीर आते रहे हैं. मुगल बादशाह अकबर को ख़्वाजा के प्रति इतनी श्रद्धा थी कि आगरा से अजमेर तक पैदल चले आए थे.
लेकिन कभी श्रद्धालुओं के लिबास को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ क्योंकि इबादत की गहराई परिधान में नहीं, आस्था की पवित्रता में निहित है.