भारत के सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का मुद्दा संविधान पीठ को सौंपने का फ़ैसला किया है.
अब तक इस मामले की सुनवाई दो न्यायधीशों की एक पीठ कर रही थी.
भारत सरकार ने हाल में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया था कि उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी आरक्षण के मुद्दे की सुनवाई संविधान पीठ से कराई जाए.
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के छात्रों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का फ़ैसला किया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर 29 मार्च को रोक लगा दी थी.
सुप्रीम कोर्ट ने पहले इस मामले की सुनवाई के लिए अगस्त की तारीख़ दी थी लेकिन केंद्र सरकार के अनुरोध पर इसकी सुनवाई पहले की गई.
न्यायाधीश अरिजीत पसायत और लोकेश्वर सिंह पांटा के पीठ ने गुरुवार को यह मामला संविधान पीठ को सौंप दिया.
अब मुख्य न्यायाधीश संविधान पीठ का गठन करेंगे.
हालांकि अब ओबीसी छात्रों को इस साल से आरक्षण मिलने की संभावना ख़त्म हो गई है.
मामला
केंद्र सरकार के आरक्षण लागू करने के फ़ैसले का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में बहुत सी याचिकाएँ दायर की गई थीं.
इन मामलों की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर इस सत्र के लिए रोक लगा थी.
न्यायालय ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि सरकार आरक्षण की नीति पर काम तो कर रही है पर उसके पास ओबीसी को आरक्षण देने के लिए कोई नया और मज़बूत आँकड़ा नहीं है.
कोर्ट ने आपत्ति जताते हुए कहा कि वर्तमान समय में ओबीसी को लेकर जो भी आँकड़े उपलब्ध हैं वे वर्ष 1931 के सर्वेक्षणों पर ही आधारित हैं और उन्हें तब से दुरुस्त नहीं किया गया है.
साथ ही यह भी कहा गया है कि क्रीमी लेयर को लेकर जो बहस शुरू हुई है उसे भी अप्रासंगिक नहीं माना जा सकता है.
आरक्षण की व्यवस्था से असहमति व्यक्त करने वाले लगातार कहते रहे हैं कि क्रीमी लेयर यानी पिछड़ी जातियों के जो लोग आर्थिक और सामाजिक रूप से मज़बूत स्थिति में आ गए हैं, उन्हें आरक्षण की सुविधा नहीं दी जानी चाहिए.
लेकिन सरकार का तर्क है कि ओबीसी को आरक्षण देने वाली मंडल आयोग की रिपोर्ट को संविधान पीठ ने स्वीकृति दी थी.