बुधवार, 16 मई, 2007 को 13:40 GMT तक के समाचार
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 'रैगिंग' पर सख़्त रुख़ अपनाते हुए शिक्षण संस्थाओं को इन घटनाओं में अनिवार्य रूप से प्राथमिकी दर्ज कराने के आदेश दिए.
आदेश में यह भी कहा गया है कि मामला दर्ज कराने में विफलता या देरी को शिक्षण संस्था की लापरवाही माना जाएगा और यह दंडनीय अपराध की श्रेणी में आएगा.
न्यायाधीश अरिजीत पसायत और एसएच कपाड़िया की खंडपीठ ने केंद्र और राज्य सरकारों को भी रैगिंग पर रोक के लिए 'रैगिंगरोधी' समितियाँ या दल गठित करने के निर्देश दिए.
अदालत ने 'रैगिंग' पर गठित राघवन समिति की कई सिफारिशों को स्वीकार करते हुए ये आदेश दिए.
निर्देश
खंडपीठ ने सरकारों से राघवन समिति की सिफ़ारिशों को तुरंत लागू करने के भी निर्देश दिए.
दरअसल, अदालत के आदेश पर ही केंद्र सरकार ने राघवन समिति का गठन किया था. आरके राघवन केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) के पूर्व निदेशक हैं.
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सभी शिक्षण संस्थाएँ साफ़-साफ बताएँ कि जो भी छात्र 'रैंगिंग' गतिविधि में लिप्त पाया जाएगा उसका प्रवेश रद्द कर दिया जाएगा और अगर सीनियर छात्र ऐसा करेंगे तो उन्हें निष्कासित कर दिया जाएगा.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जो शिक्षण संस्थाएँ अपने यहाँ रैगिंग रोकने में विफल रहेंगी, उन्हें सरकार से मिलने वाले अनुदान और अन्य आर्थिक सहायता पर रोक दी जाएगी.
अदालत ने कहा कि 'रैगिंग' के शिकार छात्रों के अभिभावकों द्वारा प्राथमिकी दर्ज कराने के बावजूद संबंधित शिक्षण संस्था अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकती.
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने देश की अदालतों से भी रैगिंग के मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए.