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शनिवार, 12 मई, 2007 को 13:16 GMT तक के समाचार

सुनील रामन
बीबीसी संवाददाता

'हार से कांग्रेस पर बढ़ेगा दबाव'

उत्तर प्रदेश चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत की तो किसी को भी उम्मीद नहीं थी. इस संदर्भ में अगर कोई सवाल पूछा जा रहा था तो वे ये कि कांग्रेस को 20 से कितनी अधिक और 40 से कितनी कम सीटें मिलेंगी.

लेकिन भारत की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य, जहाँ से 80 लोकसभा सांसद चुने जाते हैं, क्या वहाँ पर कांग्रेस के प्रदर्शन का कोई राजनीतिक और आर्थिक परिणाम देखने को मिलेगा?

पंजाब, उत्तराखंड, केरल और पश्चिचम बंगाल के विधानसभा चुनावों में हार के साथ-साथ पिछले साल भर में कांग्रेस आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और दिल्ली में स्थानीय चुनाव में भी हारी है.

अगले कुछ महीनों में गोवा और गुजरात में विधानसभा चुनाव होंगे और सभी मानते हैं कि गुजरात में एक बार फिर कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ सकता है.

सत्ताधारी यूपीए गठबंधन को चुनावी हार के साथ-साथ बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी और महंगे होते 'होम लोन' का सामना करना पड़ रहा है.

आर्थिक सुधार

आर्थिक सुधारों के जनक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सुधार की गति बढ़ाने की बात करते हैं. उनका मानना है कि आर्थिक सुधार से भारत की अधिकतर ग़रीब जनता का फ़ायदा होगा. लेकिन कई राज्यों में मिली हार का क्या सरकार की आर्थिक नीति पर कोई असर पड़ेगा?

आर्थिक समाचार पत्र 'बिज़नेस स्टैंडर्ड' के संपादक एके भट्टाचार्य का कहना है कि आर्थिक सुधार की प्रक्रिया कुछ महीनों से रुकी हुई है.

भट्टाचार्य का कहना है, "आर्थिक सुधार को आगे बढ़ाने में यूपीए के अंदर से ही बाधा है, न कि बाहर से.''

पेंशन क्षेत्र में सुधार, बैंकिंग क्षेत्र में सुधार, श्रम क़ानून में सुधार, बीमा क़ानून में संशोधन के साथ-साथ भारत सरकार को राज्यों में वैट लागू कराने पर भी ध्यान देना है.

लेकिन यूपीए का नेतृत्व कर रही कांग्रेस की राजनीतिक कमज़ोरी के चलते मनमोहन सिंह सरकार के सामने कम ही विकल्प हैं.

पिछले तीन साल से यूपीए गठबंधन के घटक दल मनमोहन सिंह द्वारा आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया बढ़ाने की कोशिशों से नाराज़ रहे हैं.

चुनावों की मजबूरी

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता सीतारम येचुरी कहते हैं कि यूपी चुनाव ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि केंद्र सरकार की नीतियों के चलते अमीरों और ग़रीबों के बीच खाई और गहरी हुई है.

येचुरी कहते हैं, ''अगर यूपीए सरकार ग्रामीण और कृषि क्षेत्र पर ध्यान नहीं देगी तो वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में उनके लिए जीतना मुश्किल हो जाएगा.''

दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषक दिवाकर मानते हैं, ''यूपीए सरकार पिछले एक साल से आपसी मतभेद का शिकार रही है. शिक्षण संस्थानों में आरक्षण से लेकर एसईज़ेड से प्रभावित लोगों के पुनर्वास जैसे महत्वपूर्ण सवालों पर यूपीए एक नहीं दिखती.''

दिवाकर कहते हैं कि आने वाले दिनों में मनमोहन सिंह सरकार से आर्थिक सुधार की नीति बढ़ाने की कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए.

वे कहते हैं, ''आज से वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव तक सरकार वही फ़ैसले लेगी जिससे उसे चुनाव में समर्थन मिलेगा न कि जिससे आर्थिक सुधार की प्रक्रिया तेज़ होगी.''

उन्होंने कहा कि अगर यूपीए चुनाव में भाजपा मज़बूत होती तो कांग्रेस यूपीए के घटक दलों पर सांप्रदायिकता का मुद्दा उठाकर दबाव डालकर अपने लिए समर्थन जुटाती.

लेकिन अब यूपीए के घटक दल कांग्रेस पर दबाव डालेंगे जिसके चलते विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में इज़ाजत दिए जाने के सवाल, एसईज़ेड के मुद्दे, श्रम क़ानून, बीमा क़ानून में बदलाव और बैंकिंग सेक्टर में सुधार जैसे सवालों पर मनमोहन सिंह सरकार अपने हाथ बंधे पाएगी.