शुक्रवार, 11 मई, 2007 को 11:50 GMT तक के समाचार
आशुतोष मिश्रा
राजनीतिक विश्लेषक
उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों से साफ़ हो गया है कि सिर्फ़ रोडशो से ही वोट नहीं मिलते और कांग्रेस को अच्छा प्रदर्शन करने के लिए ठोस वादे करने चाहिए थे.
हालाँकि कहने को कांग्रेस में राजतंत्र है, कांग्रेस की मानसिकता अब भी नेहरू-गांधी के दौर की है.
कांग्रेस बदली नहीं है और अब 30 साल पहले जैसी स्थिति नहीं रही है. नतीजों से यह बात तो साफ़ हो गई है कि एक बार चुनावी दौरा करने से कुछ नहीं होता.
साथ ही आप कोई वादा नहीं करेंगे और चाहें कि लोग आपको वोट दें तो यह नहीं चलेगा.
कांग्रेस कुछ ऐसा वादा करती कि राहुल गांधी राज्य के मुख्यमंत्री बनेंगे, तो बात बन सकती थी.
गंभीरता ज़रूरी
चुनाव गंभीर चीज है और केवल रोड शो करने से ही बात नहीं बनेगी. यह बात साबित हो गई कि एक बार दर्शन देने से जनता का वोट पाना संभव नहीं है.
हालाँकि राहुल और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पिछले दो साल में कोई 60 से 70 बार उत्तर प्रदेश आए होंगे, लेकिन हवाई अड्डे से सीधे अमेठी और रायबरेली चले गए.
उन्होंने कभी उत्तर प्रदेश के अन्य ज़िलों की स्थिति जानने की कोशिश ही नहीं की.
लोगों को ऐसा प्रतीत हो रहा है कि गांधी परिवार के लिए उत्तर प्रदेश का मतलब है अमेठी और रायबरेली.
मेरा मानना है कि राहुल गांधी का रोडशो निहायत अगंभीर प्रयास था. स्पष्ट है कि जनता को यह नहीं लगा कि यह कांग्रेस की ओर से गंभीर प्रयास किया गया है.
वोट बैंक
दरअसल, स्थिति यह है कि कांग्रेस भले ही देश की सबसे बड़ी पार्टी है लेकिन उत्तर प्रदेश में उसके पास कोई वोट बैंक नहीं बचा है.
ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम वोट उसका साथ छोड़ गए हैं. कांग्रेस अकेली ऐसी पार्टी है जिसके पास कोई भी वोट बैंक नहीं है.
जहाँ तक पार्टी के कुछ उम्मीदवारों के जीतने का प्रश्न है तो विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों और प्रभाव से जीते जाते हैं.
कांग्रेस ने जो सीटें जीतीं हैं वो निजी प्रभाव और समीकरणों के बूते जीती हैं.
मसलन अगर प्रमोद तिवारी 20 साल से विधानसभा चुनाव जीतते आ रहे हैं तो यह उनका व्यक्तिगत असर है.
कहा जा सकता है कि इसमें पार्टी का कोई बड़ा योगदान नहीं है.
ये भी कहा जा सकता है कि राहुल गांधी के रोडशो को लोगों ने ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया लेकिन यदि उन्होंने उत्तर प्रदेश की जनता से ठोस वादे किए होते तो शायद पार्टी के लिए बेहतर परिणाम निकलता.