शुक्रवार, 11 मई, 2007 को 10:29 GMT तक के समाचार
रामबहादुर राय
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के लिए जो नतीजे सामने आ रहे हैं वो दरअसल भाजपा की नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पराजय है.
संघ की पराजय इसलिए क्योंकि पिछले वर्ष दिसंबर से ही संघ ने इस चुनाव की बागडोर संभाल रखी थी.
मेरी जानकारी में यह पहला चुनाव है जिसमें संघ और विश्व हिंदू परिषद ने खुलकर अपनी पूरी ताकत झोंक रखी थी.
आपको याद दिला दूँ कि जब योगी आदित्यनाथ नाराज़ हो गए थे तो उनको मनाने के लिए अशोक सिंघल ख़ुद गए. उन्होंने राज्यभर में जाकर जगह-जगह जनसभाएँ कीं और जुलूस भी निकाले.
उधर संघ ने भी देशभर से अपने चोटी के प्रचारक जिन्हें चुनावों का विशेषज्ञ माना जाता है, उनको राज्य में कई जगहों पर तैनात कर रखा था.
इन तमाम कोशिशों के बावजूद अगर भाजपा हारी है तो इसका साफ़ मतलब है कि उत्तर प्रदेश का मतदाता और भाजपा समर्थक भाजपा से मुख मोड़ चुका है और उसे भाजपा के वादों पर कोई भरोसा नहीं है.
जितनी सीटें भाजपा को मिलती नज़र आ रही हैं उससे यह पार्टी वहीं जा पहुँची है जहाँ आज से 23 वर्ष पहले थी औऱ इसी के साथ राजनाथ सिंह के बुरे दिनों की शुरुआत हो गई है.
मिट्टी के माधो
राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश में कभी भी लोगों का नेता नहीं माना गया.
रही बात निकाय चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन के आधार पर प्रदेश की नई विधानसभा की तस्वीर देखने की तो इसे इस तरह से समझिए कि लोग सपा से नाराज़ थे और बसपा ने निकाय चुनावों में हिस्सा नहीं लिया. ऐसे में भाजपा ही एक बचा हुआ विकल्प था.
निकाय चुनाव में भाजपा का जीतना, राजनाथ सिंह का उत्तर प्रदेश का होना और भाजपा का अध्यक्ष बनना, यह सब भाजपा के लिए मरीचिका थी.
राजनाथ सिंह ने एक और प्रचार मीडिया से जुड़े अपने साथियों से करवाया कि राजनाथ सिंह बड़े तकदीर वाले नेता हैं पर इस चुनाव के बाद साफ़ हो गया है कि राजनाथ सिंह की तकदीर भी फूटी है और भाजपा की तकदीर भी.
यह भाजपा के लिए एक बड़ा झटका है और उससे भी बड़ा झटका है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए.
यह आश्चर्यजनक है कि बलबीर पुंज जैसे लोग राज्य में जाकर सभाएं कर रहे थे और अरुण जेटली दिल्ली में बैठे थे. इससे साफ़ है कि राजनाथ सिंह को कैसे लोग पसंद हैं और कैसे-कैसे लोगों को वो नेतृत्व में आगे लाना चाहते हैं.
आगे का रास्ता
पंजाब और उत्तराखंड का चुनाव पार्टी राजनाथ सिंह की वजह से नहीं जीती. वहाँ की परिस्थितियाँ अलग थीं और उसके मुताबिक लोगों ने चुनाव किया.
पर उत्तर प्रदेश के ये चुनाव राजनाथ सिंह के लिए परीक्षा की घड़ी थे क्योंकि वो पार्टी अध्यक्ष हैं और इस राज्य के भी हैं. अब आगे की रणनीति क्या होगी, इस बारे में सोचने की ज़रूरत है क्योंकि अगले एक वर्ष में जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, वो भाजपा शासित हैं.
गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अगले एक वर्ष में चुनाव हैं. अगर यहाँ के चुनावों में भाजपा को ख़ुद को संभालना है तो राजनाथ सिंह से मुक्ति पानी होगी और उमा भारती जैसे नेताओं को वापस लाना होगा.
यह तो तय है कि संघ ने जिस व्यक्ति को पार्टी के शीर्ष पर बैठाया है, उसके लिए संघ को कुछ नहीं करना है, सिर्फ़ अफ़सोस करना है. संघ को यह सोचना पड़ेगा कि अगर राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाने का यही हश्र होना था तो उमा भारती को पार्टी से बाहर न करते और कल्याण सिंह को अध्यक्ष बनाते.
कल्याण बनाम राजनाथ
उत्तर प्रदेश में लोगों का नेता भाजपा में कोई था तो वो थे कल्याण सिंह पर इन्हीं राजनाथ सिंह ने कल्याण सिंह के ख़िलाफ़ साज़िश करके इन्हें मुख्यमंत्री पद से हटवाया था और पार्टी से भी बाहर करवाया था.
जिस पार्टी में इस तरह की साज़िश होती हो और इस तरह की साजिश करने वाले को आप अगर पार्टी अध्यक्ष बनवाएं तो उसके जो परिणाम सामने आने थे वो आए हैं.
मैं समझता हूँ कि राजनाथ सिंह इस चुनाव में भी कल्याण सिंह के ख़िलाफ़ साज़िश कर रहे थे. राजनाथ सिंह इस बार भी कल्याण सिंह को ख़त्म करने के लिए ही आगे कर रहे थे.
राजनाथ सिंह समझ रहे थे कि वो ऐसी घोषणा कर देंगे और जनता बिछी चली आएगी पर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि मतदाता और पार्टी के समर्थक दोनों ही समझदार हैं और जानते हैं कि आप क्या कर रहे हैं.
विधानसभा चुनावों में भाजपा को जो जनाधार मिला है उसके बाद पार्टी में पूर्व अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी की स्थिति और मज़बूत होगी.
जिस नए नेतृत्व की कल्पना की जा सकती है उसमें लालकृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह, उमा भारती, अरुण जेटली और वैंकेया नायडु हो सकते हैं.
(बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद से बातचीत पर आधारित)