बुधवार, 09 मई, 2007 को 10:09 GMT तक के समाचार
पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता
इतिहास के पन्नों में ऐसे कई उदाहरण दर्ज हैं जिनके मुताबिक महिलाओं की संघर्षों और आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
इसी लिहाज से इस बात की टोह लेने की कोशिश की कि 19वीं सदी के दुनिया के सबसे बड़े विद्रोह कहे जाने वाले 1857 के संग्राम में महिलाओं की क्या भूमिका रही.
पड़ताल का ख़्याल आते ही एक कविता कानों में फिर से गूँज उठी- ख़ूब लड़ी मर्दानी, वो तो झांसी वाली रानी थी. बुंदेले हरबोले के मुँह हमने सुनी कहानी थी.
यानी इतना तो स्थापित सत्य है कि महिलाओं की भूमिका की चर्चा किए बगैर 1857 के इतिहास को पूरा नहीं माना जा सकता.
इसी जिज्ञासा के साथ जब कई इतिहासकारों से बातचीत की तो कुछ नाम सामने आते चले गए.
रानी की कहानी
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, जो अपनी पीठ पर बच्चे को बांधकर क़िले से निकली और अंग्रेज़ों से मुक़ाबला करती रही.
अवध की बेग़म हज़रत महल, जिन्होंने विद्रोह के दौरान एक ख़ास भूमिका निभाई और अपनी सूझ, समझदारी के लिए एक अलग जगह और पहचान हासिल की.
दिल्ली के विद्रोह में बेग़म ज़ीनत महल की भूमिका को भी नहीं भुलाया जा सकता. ज़ीनत महल यानी आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र की पत्नी.
पर चिंता की बात यह थी कि इतिहास की किताबों से लेकर कई बहसों-चर्चाओं तक अधिकतर लोग इन्हीं दरबारी नामों को दोहरा रहे थे.
इतिहासकार प्रोफ़ेसर वीएन दत्ता इस बारे में बताते हैं, “राजपरिवारों की इन रानियों की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण है कि इसके बिना इन घरानों के संघर्ष की बात पूरी नहीं होती.”
नायिकाओं का फ़र्क
इससे बाहर निकलकर देखने की कोशिश की तो पता लगा कि दरबार की रानियाँ ही नहीं, आम जनता के बीच से भी महिलाओं के कुछ नाम संघर्ष की लड़ाइयों में आगे दिखाई देते हैं. मसलन, अहिल्याबाई, रज़िया सुल्तान, उदा देवी, रानी झलकारी बाई, अवंतीबाई और रानी चेनम्मा के नाम का उल्लेख भी ज़रूरी है.
यह बात और है कि न तो इनमें से कई वीरांगनाओं का ताल्लुक न तो किसी बहुत उंचे राजपरिवार से था और न ही जाति, सामाजिक स्थिति के लिहाज से इनका बहुत सम्मानित स्थान था.
पिछड़ों के बीच से निकले ये नाम अगली पंक्ति के नायक होकर भी अगली पंक्ति में जगह नहीं पा सके. न तो इतिहास की किताबों में और न ऐतिहासिक विमर्श में.
हाँ, देश में पिछले कुछ दशकों में राजनीतिक और सामाजिक रूप से तेज़ हुए दलित आंदोलन ने ज़रूर इन नामों को लोगों के बीच प्रचारित किया और इनकी कई पाषाण या कांस्य प्रतिमाएँ उत्तर भारत के कुछ चौराहों पर देखने को मिल जाती हैं.
पर सवाल यह उठता है कि आज सामने आते नामों के आधार पर भूमिकाओं का पैमाना कैसे तय किया जाए.
हिस्सेदारी के कारण
इस बारे में जाने-माने इतिहासकार और नेशनल बुक ट्रस्ट के प्रमुख प्रोफ़ेसर बिपन चंद्र कहते हैं, “यह ज़रूर है कि कुछ महिलाओं के नाम 1857 के संदर्भ में सामने आए जिनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता पर उस दौर में जिस तरह का भारतीय समाज था, उसमें महिलाओं के प्रभावी होने की गुंजाइश ही कहाँ थी.”
हालांकि वो कहते हैं कि इस दृष्टिकोण से इतिहास को देखने पर काम न के बराबर ही हुआ है पर साथ ही उन्हें लगता है कि खोजने पर भी बहुत ज़्यादा निकलने वाला नहीं है.
इतिहासकार प्रोफ़ेसर वीएन दत्ता यहाँ एक और सवाल उठाते हैं और वह है विद्रोह के दौर के नायक-नायिकाओं को पेश करने के तरीका पर.
वो कहते हैं कि रानी लक्ष्मीबाई का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है पर इस बात के भी साक्ष्य मिलते हैं कि काफ़ी बाद तक उन्होंने अंग्रेज़ों से सुलह समझौते की कोशिशें की थीं.
इतिहासकार प्रोफ़ेसर वीएन दत्ता कहते हैं, “इतिहास को इतिहास की तरह से ही देखना चाहिए. उसमें किसी भी पक्ष को बढ़ा-चढ़ाकर बताना या किसी को जबरन नायक-नायिका साबित करना ठीक प्रवृत्ति नहीं है. फिर चाहे वह ऐतिहासिक कारणों से हो या फिर राजनीतिक-सामाजिक कारणों से.”
हालांकि कुछ इतिहासकार इससे अलग यह तर्क देने से नहीं चूकते कि लक्ष्मीबाई जन्म से किसी बड़े घराने की नहीं थीं और विधवा होते हुए उन्होंने शासन की बागडोर संभाली, संघर्ष में हिस्सा लिया जो एक आसान बात नहीं थी.
बहरहाल, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि घर के चूल्हे से बाजुओं के घावों तक और आबरू-सम्मान से लेकर भाई-पति-बेटा या पिता खोने तक महिलाएँ हर संघर्ष की एक बहुत बड़ी क़ीमत अदा करती रही हैं.