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बुधवार, 09 मई, 2007 को 09:09 GMT तक के समाचार

सब्यसाची भट्टाचार्य
अध्यक्ष, भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद

नहीं दिखता है आम भारतीय का इतिहास

इतिहास लेखन के लिहाज से देखें तो भारत की आम जनता को इतिहास में यथोचित स्थान मिला हो, ऐसा कम ही देखने को मिलता है. केवल 1857 के ही संदर्भ में ही नहीं बल्कि आज भी ऐसा ही हो रहा है.

ऐसा कहाँ दिखाई देता है कि भारत की आम जनता अपनी बात कह रही हो, अपनी कहानी बयाँ कर रहे हों.

जब 1857 के संदर्भ में हम इतिहास लेखन की शुरुआत करते हैं तो उन साक्ष्यों की ओर देखते हैं जो उस दौर के नायकों से जुड़े हुए हैं. इस दिशा में भी जो साक्ष्य बच सके थे उनमें से बहुत कम का ही लेखन में इस्तेमाल किया गया है.

हालांकि जब हम क़ानूनी कार्रवाइयों से संबंधित दस्तावेज देखते हैं या सिपाहियों की ओर से जारी कोई दस्तावेज देखते हैं तो हमें उन लोगों की आवाज़ सुनने को मिलती है जो कि निचले पायदान पर थे.

पर ऐसा बहुत कम है और अधिकतर साक्ष्य उन्हीं की कहानी कहते हैं जो कि प्रभावशाली थे और नेतृत्व देने का काम कर रहे थे. उस दौर की स्थितियाँ भी इसी तरह की थीं. यही उस दौर का सच था.

हाँ मगर हमारी ओर से ऐसी कोशिश होनी चाहिए कि विद्रोह में शामिल आम आदमी की बात भी सामने आए और उसका इतिहास, उसकी कहानी को भी लोगों तक पहुँचाया जाए.

विचारधारा और लेखन

एक सवाल उठता है विचारधाराओं के लिहाज से इतिहास लेखन और इतिहास बताने को लेकर.

मेरा निजी स्तर पर मानना है कि इतिहास का एक बड़ा हिस्सा जिसे हम जानते हैं दरअसल अलग-अलग दृष्टिकोण से घटनाओं को देखने की बहस के रूप में है और तथ्यों को समझने में अलग-अलग मत होंगे ही. इससे इनकार नहीं किया जा सकता है.

जो हमसे अलग विचारधारा के लोग हैं. हमें उन्हें भी अपनी राय रखने के लिए जगह देनी चाहिए. मुझे इस बात से कोई गुरेज नहीं है कि इतिहास को लेकर बहस और मतभेद हैं. ऐसा होता रहा है और ऐसा होता रहेगा.

इससे न तो हमें अपनी बात कहने से रोका जा सकेगा और न ही दूसरों के मत का खंडन करने या उससे तर्क करने का हमारा अधिकार छिनेगा. मैं बिना किसी को रोके अपनी बात कहना पसंद करूँगा.

हो सकता है कि हम एक-दूसरे को ग़लत कहें पर अपनी बात कहने का अधिकार तो सभी को है.

शिक्षा और इतिहास

जहाँ तक शिक्षा के क्षेत्र में इतिहास पढ़ाने का सवाल है, मैं समझता हूँ कि 1857 के संदर्भ में विचार देश की सरकारें बदलने के साथ बदलते रहेंगे. पर ऐसा नहीं है कि सरकारें बदलने से विचारों या साक्ष्यों में बहुत बड़े बदलाव हो जाएंगे.

ऐसा उसी स्थिति में हो सकता है जब भारत में फिर से किसी दूसरे पश्चिमी देश का कब्ज़ा हो जाए.

जो फ़र्क अपने यहाँ सत्ता परिवर्तन का पड़ सकता है वह इस बात को लेकर होगा कि इतिहास बताते समय हमारा रुझान क्या है. उदाहरण के लिए मैं निजी तौर पर इस बात को दोहराता रहा हूँ कि 1857 के विद्रोह ने हिंदू-मुस्लिम एकता का एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया.

हो सकता है कि कोई दूसरा राजनीतिक विचार इस बात को स्वीकार न करे. हो सकता है कि इस बड़े संदेश को कोई और विचार इतना महत्व न दे या ऐसा कुछ था, यह मानने से ही इनकार कर दे.

बावजूद इसके, मुझे लगता है कि 1857 के संघर्ष की जो मूलभूत बातें हैं, उनको लेकर एक भारतीय और दूसरे भारतीय के बीच कोई मतभेद नहीं हो सकता है.