शुक्रवार, 04 मई, 2007 को 14:56 GMT तक के समाचार
रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी के उत्तर प्रदेश संवाददाता
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में इस बार किस्मत आज़मा रहे प्रत्याशियों में आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी हुई है.
'द यूपी इलेक्शन वाच' नाम के एक ग़ैर सरकारी संगठन की तरफ़ से किए विश्लेषण में ये तथ्य सामने आया कि विचाराधीन आपराधिक मामलों वाले प्रत्याशियों की संख्या पिछले चुनाव के मुक़ाबले 74 फ़ीसदी बढ़ी है.
पिछले विधानसभा चुनावों में ऐसे 506 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे जिनके ख़िलाफ़ आपराधिक मामले चल रहे थे लेकिन इन विधानसभा चुनावों में ऐसे उम्मीदवारों की संख्या 882 तक पहुँच गई है.
इन उम्मीदवारों पर हत्या, हत्या की कोशिश और अपहरण के मामले दर्ज हैं.
आपराधिक रिकॉर्ड वाले 206 उम्मीदवार चुनावी संघर्ष में जीतकर 2002 की उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुँचे थे.
सैद्धांतिक रूप से सभी पार्टियाँ ये दावा करती रहती हैं कि वो राजनीति के आपराधिकरण के ख़िलाफ़ हैं लेकिन इस संगठन के विश्लेषण के अनुसार हर पार्टी ने आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारे हैं.
सत्ताधारी समाजवादी पार्टी की तरफ़ से सबसे अधिक दागी छवि के उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं.
उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव लड़ रहे आपराधिक छवि के कुल प्रत्याशियों में से 38 फ़ीसदी समाजवादी पार्टी की तरफ से और बहुजन समाज पार्टी से 32 फ़ीसदी ऐसे उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं.
बाहुबली
कुछ ऐसे भी आपराधिक छवि के लोग हैं जिनके ऊपर 100 से भी अधिक मामले दर्ज़ हैं.
इनमें से कुछ मुख्य हैं - कुंडा और रामपुर ख़ास से प्रकाश सिंह. अकबरपुर से पवन पांडे, अयोध्या से इंद्रदेव तिवारी उर्फ़ ख़ब्बू तिवारी, मऊ से मुख़्तार अंसारी, इसौली से कक्कू पांडे, धानपुर से सुशील कुमार, गंगापुर से ललऊ विश्वकर्मा, मेहरोनी से पूरन सिंह बुंदेला, लालगंज से भूपेंद्र...
कुछ ऐसे भी माफ़िया चुनाव में हैं जो किसी भी राजनीतिक दल का सहारा लिए बिना चुनाव मे उतरे हैं.
कुछ नेता तो जाने-माने माफ़िया हैं. वे अपनी आपराधिक गतिविधियों से काफ़ी पैसा उगाहते हैं.
ऐसे नेता अधिकारियों पर दबाव डालकर उनसे ज़बर्दस्ती सड़क, पुल और इमारत बनाने के ठेके ले लेते हैं.
ऐसे नेता कई बार इन पैसों का इस्तेमाल ग़रीबों की सहायता के लिए भी करते हैं.
ये बाहुबली नेता दावा करते हैं कि वे अपने क्षेत्र की जनता को पुलिस और भ्रष्ट अधिकारियों से बचाते हैं इसीलिए ऐसे प्रत्याशी अपने क्षेत्रों से चुनाव जीत जाते हैं क्योंकि जनता इनका समर्थन करती है.
एक डाकू ने अपनी माँ को प्रत्याशी बनाया हुआ है जबकि दूसरा अपने भाई को चुनाव लड़ा रहा है.
भारतीय चुनाव क़ानूनों के तहत एक अभियुक्त व्यक्ति चुनावों में खड़ा हो सकता है लेकिन जिस पर सर्वोच्च न्यायालय में आरोप सिद्ध हो चुका हो और दोषी क़रार दिया जा चुका हो, ऐसा व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता.
क़ानूनी प्रक्रिया में बहुत समय लगता ही है, कई बार गवाहों को डराया-धमकाया भी जाता है. इस तरह अपराधियों को समय पर सज़ा नहीं मिल पाती.
आपराधिक इतिहास वाले इतने अधिक प्रत्याशी मैदान में होने की वजह से ये क़यास लगाए जा रहे हैं कि इस बार विधानसभा पहुँचने वाले विधायकों में भी इन लोगों की भारी तादाद हो सकती है.