मंगलवार, 01 मई, 2007 को 11:49 GMT तक के समाचार
सलमान रावी
पूर्वी सिंहभूम की दलमा पहाड़ियों से
झारखंड में वन विभाग के प्रतिबंध के बावजूद आदिवासियों के पारंपरिक 'विशु शिकार' के दौरान सोमवार को आदिवासियों ने दलमा पहाड़ियों में घुसकर अनेक जंगली जानवरों का शिकार किया है.
आदिवासियों की यह परंपरा लगभग सौ साल पुरानी है जिसके तहत बैसाखी के दिन ही आदिवासी पुजारियों और मुखियाओं द्वारा पूजा के बाद 'विशु' के पारंपरिक शिकार का दिन तय होता है.
हर साल हज़ारों की संख्या में आदिवासी बच्चे, नौजवान और बुजुर्ग शिकार की इस रस्म को अदा करते आए हैं.
इस बार राज्य के वन विभाग ने विशु शिकार पर प्रतिबंध लगाते हुए पूरे दलमा क्षेत्र की नाकेबंदी कर दी थी.
अनेक जानवरों का शिकार
'विशु' के मौके पर सरकारी रोक के बावजूद झारखंड के आदिवासी दलमा पहाड़ियों में घुसे और उन्होंने अनेक जंगली जानवरों का शिकार कर ये पारंपरिक रस्म अदा की.
माओवादी विद्रोहियों की दहशत, वन विभाग की नाकेबंदी और पारंपरिक आदिवासी शिकारियों के गुस्से के कारण झारखंड के पूर्वी सिंहभूम ज़िले के दलमा के जंगलों में सोमवार का दिन काफ़ी मुश्किलों भरा रहा.
रविवार की देर रात से ही हज़ारों की संख्या में आदिवासी शिकारी वन विभाग के आदेश को धत्ता बताते हुए दलमा पहाड़ियों के जगंलों में घुस गए.
'वीर दिशुवा' (आदिवासी योद्धा) ने हाथों में पारंपरिक हथियार उठाए रखे थे और ढोल-नगाड़े बजाए जा रहे थे.
शिकार के बाद जब आदिवासी शिकारी सोमवार देर रात दलमा पहाड़ियों पर से उतरे तो उनके हाथों में थे - लाल गिलहरी, जंगली सुअर, हिरण, खरगोश और जंगली बिल्ली जैसे जानवर थे.
कुछ आदिवासी शिकारियों का दावा था कि इस बार उन्होंने दुर्लभ भालू का भी शिकार किया.
वन संरक्षकों का दावा
उधर घने जंगल में डेरा डाले झारखंड के मुख्य वन संरक्षक एके सिंह ने बीबीसी से कहा, "इस बार हमने 11 गश्ती दलों के साथ-साथ सात दंडाधिकारियों को तैनात किया था. साथ ही दलमा आने के सभी रास्तों की नाकेबंदी भी की गई."
दूसरी ओर दलमा विशु संद्रा समिति के अध्यक्ष डेमरा सोय ने दावा किया कि उनकी जानकारी में 15 जंगली जानवरों का शिकार किया गया.
कुछ अन्य आदिवासियों का दावा था कि शिकार किए गए जानवरों की संख्या ज़्यादा है.
डेमरा सोय कहते हैं, "हमारे पारंपरिक शिकार पर रोक लगाकर वन विभाग ने अच्छा नहीं किया. वनों को आदिवासियों से ख़तरा नहीं है. ख़तरा तो दलमा के इर्द-गिर्द पनप रहे हज़ारों क्रशर मशीनों से है जिनकी वजह से प्रदूषण फैल रहा है और जानवर जंगल से भागने को मजबूर हैं."
आदिवासी मान्यताओं के अनुसार अगर किसी वर्ष ‘विशु शिकार’ का आयोजन नहीं किया जाता है तो उस वर्ष इलाके में भुखमरी, अकाल, बीमारी या फिर प्राकृतिक आपदा का प्रकोप होता है.
मुख्य वन संरक्षक एके सिंह का कहना था कि उनका विभाग आदिवासी समाज में जागरुकता लाने की कोशिश कर रहा है. यही वजह है कि पिछले वर्षों की तुलना में इस वर्ष शिकारियों की संख्या में काफ़ी कमी आई है.