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गुरुवार, 26 अप्रैल, 2007 को 15:25 GMT तक के समाचार

राम दत्त त्रिपाठी
बीबीसी के उत्तर प्रदेश संवाददाता

बांदा-चित्रकूट में डकैतों का आतंक

ग़रीबी और सूखे की वजह से अकाल की मार झेल रहे उत्तर प्रदेश के बांदा-चित्रकूट ज़िलों में दो डाकू गिरोह खुलेआम लोकतंत्र पर डाका डालने की कोशिश कर रहे हैं.

चुनाव आयोग की तरफ से भेजे गए पुलिस और अर्द्धसैनिक बल भी पहाड़ी और जंगली क्षेत्रों में बसे गांववालों में भरोसा क़ायम करने में नाकाम रहे हैं.

ददुआ और ठोकिया दोनों डाकू गिरोहों के लोग गांव-गांव में मतदाताओं को धमका रहे हैं कि वोट डालने वाली ईवीएम मशीनों से वो ये पता कर लेंगे कि किस बूथ पर उनके और विरोधी प्रत्याशी को कितने वोट मिले.

गांव वालों को डर है कि परिणाम आने के बाद जिन इलाक़ों में इन गिरोहों के उम्मीदवार हारेंगे वहां वे कहर बरपा सकते हैं.

डॉ अंबिका प्रसाद पटेल उर्फ़ ठोकिया मध्य प्रदेश से कोई डिग्री लेकर छोटी-मोटी डॉक्टरी करता था. चार-पांच साल पहले वह डाकू बन गया.

पुलिस ने उस पर साढ़े तीन लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा है.

स्थानीय पत्रकारों के अनुसार ठोकिया पहले तो ददुआ के ज़रिए अपनी मां को नरैनी विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिलाना चाहता था.

बात नहीं बनी तो उसने राष्ट्रीय लोकदल का टिकट हासिल किया.

स्थानीय पत्रकार अशोक निगम का कहना है कि हथियार बंद ठोकिया ने गांव-गांव घूमकर ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ने वाले जीते-हारे प्रत्याशियों की बैठकें की हैं.

ठोकिया ने इन लोगों से कहा कि जिसको जितने वोट मिले थे उसकी तरफ से मेरी मां को उतने ही वोट मिलने चाहिए वरना चुनाव के बाद जब सुरक्षा बल चले जाएंगे तब उनकी ख़ैर नहीं.

एक अन्य पत्रकार रामलाल जयन ने ठोकिया की मां पियरी देवी का चुनाव प्रचार देखा है.

रामलाल का कहना है कि पियरी देवी एक लोकप्रिय नेता की तरह वोट मांगती हैं. ठोकिया कहीं-कहीं विनम्रतापूर्वक गांवों के बुज़ुर्गों के पैर भी छू लेता है.

लेकिन उसकी विनम्रता भी डरावनी है. पत्रकार अशोक निगम का कहना है कि ठोकिया ने पहले ही धमकी देकर लोगों को डरा दिया है.

दादागिरी

उधर ददुआ कर्वी-मानिकपुर क्षेत्र में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के लिए प्रचार कर रहा है.

उसका नारा है, 'बटन दबेगा साइकिल पर, नहीं तो गोली छाती पर'.

ददुआ अपने भाई बाल कुमार को कर्वी सीट से चुनाव लड़ाना चाहता था लेकिन बालकुमार प्रतापगढ़ ज़िले की पट्टी सीट से प्रत्याशी है.

वहां से शिकायतें मिली हैं कि बाल कुमार न केवल मतदाताओं को बल्कि अधिकारियों को भी डरा धमका रहा है.

स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि ददुआ इससे पहले बहुजन समाज पार्टी का समर्थक था लेकिन मायावती सरकार जाने के बाद वह समाजवादी पार्टी के साथ हो गया.

ददुआ और ठोकिया दोनों ने अपने परिवार के रिश्तेदारों को ग्राम प्रधान, बीडीसी और ज़िला परिषद में पदाधिकारी बनवा रखा है.

यह भी पता चला कि ये दोनों डाकू गिरोह सरकारी योजनाओं के टेकेदारों से आठ से 10 प्रतिशत कमीशन लेते हैं जिसे 'डाकू टैक्स' कहा जाता है.

यह इनकी आर्थिक ताक़त का आधार है जिससे ये हथियार, गाड़ियां और फ़ोन खरीदते हैं.

अधिकारी दबी ज़ुबान में कहते हैं कि राजनीतिक संरक्षण की वजह से वो लाचार हैं लेकिन ये भी सच है कि पुलिस और सरकारी महकमों में इन दोनों डाकू गिरोहों के मुख़बिर और मददगार हैं.

दोनों डाकुओं को उनकी कुर्मी बिरादरी का समर्थन हासिल है.

सुरक्षा

एक मोट अनुमान के अनुसार पिछले डेढ़ दशक में सरकार ददुआ के सफ़ाए पर 80 करोड़ से अधिक की राशि ख़र्च कर चुकी है.

सशस्त्र बल पीएसी और एसटीएफ़ के अलावा अब चुनावों में दूसरे अर्द्धसैनिक बल भी आ चुके हैं लेकिन कोई ददुआ की छाया तक भी नहीं पहुँच पाया है.

चुनाव आयोग को इन डाकू गिरोहों की तरफ से डाका डालने की जानकारी है.

पुलिस महानिदेशक जीएल शर्मा और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी अनुज कुमार बिश्नोई ने भी इलाक़े का दौरा किया.

चित्रकूट के ज़िला मजिस्ट्रेट आरके सिंह का कहना है कि डाकू गिरोहों को मतदाताओं को डराने, धमकाने या सताने नहीं दिया जाएगा.

लेकिन ये सब कदम अभी अपर्याप्त हैं और लोगों में भरोसा कायम करने में नाकाम रहे हैं.

ख़ासकर जंगली और सुदूर इलाक़ों में बसे लोग सोचते हैं कि उनकी रक्षा पुलिस या पीएसी नहीं कर पाएगी.