बुधवार, 25 अप्रैल, 2007 को 11:48 GMT तक के समाचार
मसूद आलम
इस्लामाबाद से
आज़ादी और शर्मिंदगी अक्सर ऐसी जगहों पर मिलती हैं जहाँ आपको उनकी उम्मीद नहीं होती.
आज़ादी की तलाश में मैं कई पश्चिमी देशों में भटका लेकिन कहीं भी असली आज़ादी नहीं देखी, अपने देश लौटकर उसे पाने का इरादा किया तो असली आज़ादी देखी, बिल्कुल ख़ालिस, बिना किसी मिलावट.
मैंने पाया कि पाकिस्तान में तो सभी आज़ाद हैं, हर तरह से.
कभी-कभी तो लगता है कि पाकिस्तान में पाई जाने वाली इस आज़ादी को देखकर पश्चिमी देशों के लोग भी ईर्ष्या करने लगेंगे.
मगर शायद वे इस तरह की आज़ादी का आनंद नहीं ले सकते क्योंकि वे बहुत से नियम-क़ानूनों से बंधे होते हैं. इसीलिए वे शाम ढलते ही और ख़ासतौर से शनिवार और रविवार की छुट्टियों में नाइट क्लबों के बाहर लाइन लगाते नज़र आते हैं.
लेकिन पाकिस्तान में अगर किसी व्यक्ति को कुछ अच्छा लगता है तो उसके रास्ते में आने का अधिकार किसी को भी नहीं है.
एक दिन मैंने देखा कि सेना के कुछ जनरलों ने इस्लामाबाद में एक सम्मलेन में थकान भरा हुआ दिन गुज़ारने के बाद फ़ैसला किया - अब कुछ मनोरंजन कर लिया जाए. और बस शहर में चल रहे संगीत नाटक बॉम्बे ड्रीम्ज़ के पहले से बिक चुका पूरा शो ही रद्द करवा दिया और ख़ुद शो देखने जा पहुँचे.
भारतीय संगीतकार एआर रहमान के संगीत से सजे इस संगीत-नाटक में पाकिस्तानी लड़कियाँ ही नृत्य करती हैं.
है ना यह सचमुच की आज़ादी जहाँ मर्ज़ी के मुताबिक काम कर लिया जाए.
पाकिस्तान में हालाँकि क़ानून की नज़र में शराब पीने पर पाबंदी है लेकिन उद्योगपतियों को शराब बनाने की आज़ादी है और जब शराब बनेगी तो बिकेगी भी, और उसे बेचने के रास्ते तो उद्योगपति निकाल ही लेते हैं.
शराब के शौकीन अपने घर के दरवाज़े पर ही शराब की बोतल हासिल कर लेते हैं और वो भी लगभग उसी दाम पर जो अमरीका में लोग शराब की दुकानों पर अदा करते हैं.
लंदन के हाइड पार्क में एक स्पीकर कॉर्नर है रविवार को कोई भी वहाँ पहुँचकर अपनी भड़ास निकाल सकता है, मुद्दा कोई भी हो, राजनीतिक, धार्मिक या फिर कोई भी...
लेकिन पाकिस्तान में किसी को कुछ भी बोलने का अधिकार तो व्यक्ति की इच्छा पर होता है कि वह कहीं भी, किसी भी समय कुछ भी बोल सकता है.
राजधानी इस्लामाबाद में एक मस्जिद के इमाम गाहे-बगाहे सरकार को सार्वजनिक रूप से बुरा-भला कहते हैं और यहाँ तक कि आत्मघाती बम हमलों की धमकी भी देते हैं लेकिन फिर भी सरकार उनके ख़र्च चलाने के लिए कुछ रक़म भी देती रहती है.
पाकिस्तान में मीडिया को इस बारे में अटकलें लगाने की आज़ादी है कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ और विपक्षी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बीच कुछ गुप्त समझौता हो गया है, हालाँकि दोनों ही पार्टियाँ ऐसी किसी सौदेबाज़ी से इनकार करती हैं लेकिन कौन जाने भविष्य में वे इसे स्वीकार कर लें.
और आम लोग भी इस बारे में कोई भी राय बनाने के लिए आज़ाद हैं कि उन पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता.
सेक्स
मेरे एक सहयोगी ने पाकिस्तान में यौन विषय पर एक फ़ीचर बनाते समय लाहौर में सड़क पर दुकान चलाने वाले एक ऐसे व्यक्ति का इंटरव्यू किया जो ख़ुद को एक डॉक्टर बताता था. वह यौन संबंधी बीमारियों का शर्तिया इलाज करने वाली जड़ी-बूटियाँ बेचता था.
उसका कहना था कि पूरे साल उसका धंधा काफ़ी अच्छा चलता है क्योंकि ज़्यादातर लोग अपने यौन अंगों पर कम ही नियंत्रण रखते हैं ठीक उसी तरह जैसे उनकी ज़ुबान काबू में नहीं रहती.
मर्दों ही नहीं, औरतों को भी पूरी आज़ादी है, जैसा कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने एक बार कहा था कि महिलाएँ यौन अपराधों की दुहाई देकर यूरोप या कनाडा जाने का रास्ता आसानी से पा सकती हैं.
राजनीति की बात करें तो पश्चिमी देशों में कुछ मुट्ठी भर राजनीतिज्ञ सरकार चलाते हैं लेकिन पाकिस्तान का राजनीतिक ढाँचा इससे बिल्कुल भिन्न है.
सेना को बहुत से कमांडर राजनीति में आ जाते हैं, सर्विस में रहते हुए या फिर रिटायर होने के बाद. विश्व बैंक के कुछ अधिकारी, अनपढ़ ज़मींदार, कुछ पढ़े-लिखे उद्योगपति, राजनीति और सार्वजनिक जीवन में पहले से सक्रिय लोगों के बेटे-बेटियाँ, जो चाहे, नेता बनने के लिए आज़ाद हैं.
सड़क पर तो और भी ज़्यादा आज़ादी नज़र आती है. ऐसा लगता है कि पाकिस्तान में मोटर साइकिल से लेकर कोई बड़ा वाहन चलाने तक ड्राइविंग लाइसेंस की ज़रूरत ही नहीं है और न ही पुलिस यातायात के नियमों और सुरक्षा को लेकर कोई ज़िम्मेदारी उठाने को तैयार नज़र आती है.
सड़क पर
पाकिस्तान में बहुत लोगों का मानना है कि नियम-क़ानून सरकार के हाथों में एक हथियार की तरह हैं जिनके ज़रिए वे लोगों का दमन करते हैं और इस तरह के नियम-क़ानूनों के लिए उनके जैसे समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए. इसलिए सड़क पर किसी भी तरह का वाहन चलाने वाले पूरी आज़ादी के साथ सड़क का इस्तेमाल करते हैं.
एक ही सड़क पर पैदल, साइकिल, घोड़ा-गाड़ी और तमाम अन्य तरह के वाहन चलते हैं.
नियम ये है कि जब कुछ शक हो तो बस ज़ोर से हॉर्न या भोंपू बजा दो. पाकिस्तान में ड्राइवरों को अपने वाहनों के ब्रेक या स्टीयरिंग और यहाँ तक कि अपनी आँखों के बजाय हॉर्न पर ज़्यादा भरोसा होता है.
पाकिस्तान में आज़ादी की हद और दायरा देखकर में सचमुच बहुत प्रभावित हूँ और आश्चर्यकित भी कि पाकिस्तान के पर्यटन मंत्रालय ने इन विशेषताओं को अपने ब्रोशर में क्यों नहीं गिनाया है.