चूहों के कारण अकाल... सुनने में अटपटा लगता है, लेकिन बर्मा और बांग्लादेश से सटा हुआ भारत का पूर्वोत्तर राज्य मिज़ोरम ऐसी ही प्राकृतिक आपदा से जूझ रहा है.
मिज़ोरम में चूहों की तेज़ी से बढ़ती आबादी स्थानीय लोगों के लिए बड़ा सिरदर्द बन गई है.
इन चूहों से खेत में खड़ी फ़सलों और खलियानों में रखे अन्न भंडारों के तेज़ी से ख़त्म हो जाने का ख़तरा पैदा हो गया है.
दरअसल, ऐसा बाँस में फूल खिलने के कारण होता है. पूर्वोत्तर क्षेत्र में बाँस की खेती बड़े पैमाने पर होती है और लगभग 48 साल के बाद इनमें ऐसे फूल खिलते हैं.
इन फूलों को हज़म करने से चूहों की प्रजनन क्षमता में गुणात्मक बढ़ोतरी होती है. मिज़ोरम के लिए यह दौर किसी बुरे सपने से कम नहीं है और मिज़ो आदिवासी इसे 'मॉतम' कहते हैं.
अधिकांश मिज़ो किसानों में चूहों की इतनी दहशत है कि वे इस साल धान और मक्का की खेती भी नहीं कर रहे हैं.
राज्य के कृषि विभाग को भी इस नुक़सान का बख़ूबी अंदाज़ा है और उसका कहना है कि अगले साल फ़सल उत्पादन में 75 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है.
कहर
चूहों की बढ़ती तादाद से 1959 की यादें ताज़ा हो गई हैं, जब चूहों ने मिज़ोरम में जमकर तबाही मचाई थी और भयंकर अकाल की स्थिति पैदा कर दी थी.
उस समय असम एकीकृत असम प्रांत का हिस्सा था और स्थिति से निपटने में प्रशासनिक विफलता के बाद मिज़ो युवाओं ने हथियार उठा लिए थे.
उनका मानना था कि भारत सरकार ने स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त क़दम नहीं उठाए.
इन युवाओं ने अलगाववादी संगठन मिज़ो नेशनल फ़्रंट का गठन किया. इस संगठन का नेतृत्व करने वाली पार्टी ही अब मिज़ोरम में सत्ता में है.
हर पूँछ का एक रुपया
पिछले वर्ष के अंत में भी मिज़ोरम के कई हिस्सों में बाँस में फूल खिले थे.
इसके बाद सरकार ने किसानों को चूहों को मारने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से एक दिलचस्प योजना निकाली थी.
इस योजना के तहत हर चूहे की पूँछ पर एक रुपए का ईनाम था और इस योजना के तहत लगभग ढाई लाख चूहे मारे गए थे.
मिज़ोरम सरकार का कहना है कि वह नुक़सान को कम से कम करने के उपाय भर कर सकती है.
हर पचास साल बाद आने वाली इस 'विभीषिका' से बचने का कोई रास्ता नहीं है.
राज्य सरकार ने केंद्र से खाद्यान्न की अतिरिक्त आपूर्ति की माँग की है, ताकि राज्य में अकाल से कोई मौत न हो.