http://www.bbcchindi.com

सोमवार, 16 अप्रैल, 2007 को 20:26 GMT तक के समाचार

रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता

रुहेलखंड की हर सीट पर अलग समीकरण

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के तीसरे चरण में रुहेलखंड की 57 सीटों के लिए चुनाव प्रचार ख़त्म हो गया है. पिछले चुनाव में समाजवादी पार्टी ने यहाँ अपना परचम लहराया था.

कन्नौज, मुरादाबाद और बरेली में इसी दौर में मतदान होना है. वर्ष 2002 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को 57 में से सिर्फ़ 11 सीटें मिली थी.

उस समय कल्याण सिंह बाग़ी मुद्रा में थे. बहुजन समाज पार्टी को नौ और कांग्रेस को पाँच सीटों से संतोष करना पड़ा था जबकि निर्दलीय के खाते में भी पाँच सीटें गईं.

सामाजिक आधार पर देखें तो रुहेलखंड में मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में हैं और कई सीटों पर उनकी निर्णायक भूमिका होगी. साथ ही यादव, कुर्मी, लोध जैसी पिछड़ी जातियों की संख्या भी कई सीटों पर अधिक है.

पिछले चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) को सबसे बड़ी पार्टी बनाने में इस इलाक़े का बड़ा योगदान था और उस समय पार्टी को 25 सीटें मिली थीं. साथ ही 17 सीटों पर वह दूसरे नंबर पर थी.

बदलाव की बयार

मुलायम सिंह यादव इसी इलाक़े में बदायूँ ज़िले की गुन्नौर विधानसभा सीट से दोबारा चुनाव लड़ रहे हैं. इस दौर का मतदान यह तय कर सकता है कि सपा दोबारा नंबर एक पार्टी बनेगी या नहीं.

कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करके भाजपा भी इस बार यहाँ अपनी स्थिति सुधारने में लगी है.

भाजपा को उम्मीद है कि अपना दल के साथ गठबंधन से कुर्मी मतदाताओं को वह अपनी ओर आकर्षित कर सकती है. इससे भी ज़्यादा भाजपा को भरोसा है कि हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण उसके लाभ पहुँचा सकता है.

बिजनौर से चुनावी राजनीति शुरू करने वाली बसपा प्रमुख मायावती ने अपने दलित-मुस्लिम गठजोड़ में अब ऊँची जातियों को भी शामिल कर लिया है. प्रेक्षकों का कहना है कि पार्टी को यहाँ लाभ मिल सकता है.

दिल्ली पर हुक़ूमत करने वाली कांग्रेस यहाँ चौथे नंबर की पार्टी है और उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है.

सीटें बढ़े या नहीं बढ़े लेकिन मतदान का औसत बढ़ जाए, इसी चिंता में डूबी कांग्रेस यहाँ मुस्लिम और सिख समुदायों पर नज़रें गड़ाए हुए है.

रुहेलखंड के इस इलाक़े में तराई का क्षेत्र भी शामिल है. लेकिन इत्तेहादे मिल्लत कॉंन्सिल ने कई इलाक़ों में उम्मीदवार खड़ा करके सपा और कांग्रेस की नींद हराम कर रखी है.

प्रेक्षकों का कहना है कि हर सीट पर एक अलग समीकरण है और चुनाव में पार्टी से ज़्यादा उम्मीदवार का अपना व्यक्तित्व और व्यवहार अहम भूमिका निभाएगा.