शुक्रवार, 13 अप्रैल, 2007 को 10:09 GMT तक के समाचार
रेहान फ़ज़ल
बीबीसी संवाददाता, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से
मायावती अपने दलित वोट बैंक के लिए तो जानी जाती रही हैं लेकिन इस बार उन्होंने सवर्ण जातियों के लोगों को भी अच्छी तादाद में टिकट देकर उन्हें भी अपनी तरफ़ करने की कोशिश की है.
क्या नई रणनीति उनके लिए ट्रंप कार्ड साबित हो सकती है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रस्तावित 'हरित प्रदेश' और जाट पट्टी में अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के लिए ख़तरे की घंटी हो सकती है?
मायावती ने किसी स्थापत्य कला के स्कूल में भले ही पढ़ाई न की हो लेकिन जिस तरह से उन्होंने उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के ज़रिए अपने लिए जनाधार की इमारत खड़ी की है उसने चुनाव पंडितों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा है.
अगर मायावती अपने इस प्रयोग में सफ़ल होती हैं तो कम से कम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई स्थापित किले ढह सकते हैं. मसलन बागपत, जो कि चौधरी चरण सिंह से लगभग उसी तरह जुड़ा हुआ है जैसे कि रायबरेली और अमेठी से नेहरू परिवार.
बागपत में मायावती ने राष्ट्रीय लोकदल के सशक्त उम्मीदवार कोकब हमीद के ख़िलाफ़ अनिल जैन को टिकट दिया है. अनिल जैन को 40000 दलित मतों के साथ करीब 30 हज़ार वैश्य वोटों का समर्थन मिल रहा है.
अनिल जैन कहते हैं, ''यहाँ पर जाट और मुस्लिम क़रीब एक लाख हैं और दलित-वैश्य लगभग 80 हज़ार हैं. उसमें बँटवारा है, इसमें बँटवारा नहीं है. बाक़ी गुर्जर समुदाय एक पक्षीय हमारा समर्थन कर रहा है और 50 प्रतिशत ब्राह्मण हमें सहयोग दे रहे हैं.''
'फ़ायदा मिलेगा'
पूर्व मंत्री कोकब हमीद वैसे तो कह रहे हैं कि चौधरी चरण सिंह ने जो मुस्लिम-जाट समीकरण बनाया था वो बरकरार है लेकिन ये तो वो भी मानते हैं कि मायावती का ये प्रयोग उन्हें कुछ न कुछ तो फ़ायदा पहुँचा ही रहा है.
कोकब हमीद कहते हैं, ''जो सोशल इंजीनियरिंग उन्होंने की हैं और जो तरीक़ा उन्होंने अपनाया है कहीं न कहीं फ़ायदा उन्हें हुआ ही होगा मगर इतना लंबा फ़ायदा नहीं जितना बताया जा रहा है क्योंक एक अजीब सी स्थिति है.''
वे कहते हैं कि पाँच साल पहले जो हरिजन वोट के साथ सौ फ़ीसदी वाली बात ख़त्म हो गई है. वह भी अब दूसरों के बारे में सोचने लगे हैं ''
चरण सिंह के ज़माने में 88 सीटें जीतने वाले अजित सिंह की पार्टी पिछले चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन करके मात्र 14 सीटें जीत पाई थी.
इस बार सत्ता में रहने का नुकसान भी उन्हें भुगतना पड़ रहा है लेकिन उसके जाट-मुस्लिम समर्थक अभी भी पुराने दिनों के बल पर नैया पार करने के प्रति आश्वस्त हैं.
हालांकि अजित सिंह के बड़े से बड़े समर्थक भी मानते हैं कि ज़िले की चारों सीटें बागपत, छपरौली, बरनावा और खेकड़ा में मायावती की बहुजन समाज पार्टी उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी है.
'मायावती की मजबूरी'
अब वो दिन हवा हुए जब बीएसपी के समर्थक सिर्फ़ जाति के आधार पर वोट माँगते थे. अब तो बकायदा क्षेत्र के विकास का ब्लू प्रिंट उनके पास है.
उनके बागपत के उम्मीदवार अनिल जैन कहते हैं,''दिल्ली के आसपास चाहे वह उत्तर प्रदेश या हरियाणा का हिस्सा हो वहाँ विकास है. लेकिन क्या कारण है कि एक छोटी पट्टी जो बागपत की तरफ आता है यहाँ बिल्कुल कुछ भी नहीं है.''
वे पूछते हैं,'' इस क्षेत्र में औद्योगिक क्राँति क्यों नहीं आई? दरअसल लोगों नीयत बिल्कुल नहीं थी. जब उद्योग लगते हैं तो कुछ लोगों को रोज़गार मिलते हैं और जेब में पैसा होता है तो आदमी सोचता-समझता है और हरियाणा की तरह सत्ता में परिवर्तन कर देता है.''
अनिल बक्शी मेरठ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष हैं. उनका मानना है कि दूसरी जातियों का समर्थन हासिल करना मायावती की राजनीतिक मजबूरी है.
वे कहते हैं, '' उन्हें क्या सबको पता है कि एक जाति या बिरादरी के आधार पर कोई भी चुनाव नहीं जीत सकता. उन्होंने अनुसूचित जाति के नाम पर अपनी दुकानदारी चलाई और उसका क्रय-बिक्रय कर रही हैं. विकल्प के अभाव में सतीश मिश्रा, ब्रजेश पाठक और रामवीर उपाध्याय के प्रयासों से ब्राह्मणों को बहनजी अपने दल में लाई हैं. देखते हैं इसका परिणाम कैसा निकलता है.''
मायावती ने जाट लैंड में जाटों, बनियों और ब्राह्मणों को टिकट देकर अजित सिंह के समर्थकों में सेंध लगाने की कोशिश की है.
देखना ये है कि मायावती के दलित वोट के साथ-साथ ब्राह्ममणों, जाटों और बनियों को हाथी पर बैठने की कोशिश कितना रंग लाती है.