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शुक्रवार, 06 अप्रैल, 2007 को 10:34 GMT तक के समाचार

रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी के उत्तर प्रदेश संवाददाता

फिर उभरने लगे हैं सांप्रदायिक मुद्दे

बहुत सालों बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव एक ऐसे माहौल में हो रहा था जिसमें सांप्रदायिक या धार्मिक ध्रुवीकरण न्यूनतम स्तर पर था.

लेकिन हाल की कुछ ताबड़तोड़ घटनाओं से एक बार फिर मतदान से ठीक पहले हिंदू और मुसलमानों से जुड़े सांप्रदायिक मुद्दे उभर रहे हैं.

हाल ही में लखनऊ और कानपुर में हुए मामूली दंगों के बाद निर्वाचन आयोग ने आशंका जताई थी कि राज्य में चुनाव के दौरान सांप्रदायिक दंगे हो सकते हैं.

इसके तुरंत बाद भाजपा की ओर से चुनाव प्रचार के लिए जारी एक सीडी ने हंगामा खड़ा कर दिया.

इस सीडी में मुख्य रूप से गोहत्या, बाबरी मस्जिद और गोधरा कांड जैसे मुद्दों को बहुत ही उत्तेजक और आक्रमक ढंग से पेश करते हुए हिंदुत्ववादी शक्तियों से एकजुट होने का आह्वान किया गया था.

ये सीडी, विमोचन के दौरान मीडिया को भी दी गई और उस पर बवाल खड़ा हो गया. धार्मिक विद्वेष फैलाना भारतीय दंड संहिता में तो जुर्म है ही चुनाव क़ानून में भी इस पर रोक है.

ये मुद्दा चुनाव आयोग के पास गया और उसने फौरन कार्रवाई की, जिससे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सीडी वापस लेने की बात कही है. इस प्रकरण से मीडिया के ज़रिए भाजपा का हिंदुत्ववादी एजेंडा प्रसारित हुआ.

दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, जनमोर्चा और कई मुस्लिम संगठनों ने भाजपा के ख़िलाफ़ जो आक्रमक रुख अपनाया है उसका मक़सद मुस्लिम मतदाताओं से अपना तार जोड़ना समझा जाता है.

न्यायालय का फ़ैसला

इन सबसे बड़ा मुद्दा अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला हो गया है जिसमें उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय का अल्पसंख्यक दर्जा समाप्त करने का आदेश दिया गया है.

ग़ौरतलब है कि जज ने कारणों सहित विस्तृत फ़ैसला देने के बजाय दो पेज का संक्षिप्त निर्णय दिया है और विस्तृत फ़ैसला बाद में देने की बात कही है.

यह फ़ैसला एक मदरसे की याचिका पर दिया गया है जिसमें मदरसे को अल्पसंख्यक संस्थान को मिलने वाला अनुदान देने की माँग की गई थी.

इसमें जस्टिस एस एन श्रीवास्तव ने अपनी ओर से यह मुद्दा भी जोड़ लिया कि उत्तर प्रदेश में मुसलमानों को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए या नहीं.

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल एसएमए काज़मी ने इस पर आपत्ति जताई थी.

सभी संविधान विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि भारतीय संविधान में किसी धार्मिक या भाषाई समुदाय को अल्पसंख्यक रूप से दर्जा देने के लिए कोई अनुपात निर्धारित नहीं किया गया है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के ग्यारह जजों की एक पूर्ण पीठ ने फ़ैसला दिया था कि अल्पसंख्यक का दर्जा हर राज्य में आबादी के हिसाब से अलग-अलग निर्धारित होगा.

क़ानून के जानकारों का कहना है कि जस्टिस एसएन श्रीवास्तव का फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय किए गए सिद्धांतों के विपरीत है.

जैसा कि स्वभाविक था मुस्लिम संगठनों ने इस फ़ैसले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है क्योंकि अल्पसंख्यकों को इसके तहत धार्मिक, शिक्षा और रोज़गार के मामले में कई सुविधाएँ हासिल हैं.

इस बात की भी पूरी संभावना है कि इस पर रोक मिल जाए लेकिन फ़ैसले ने मुस्लिम समुदाय को इस तरह झकझोड़ दिया है कि इससे ज्यादा बड़ी संभावना है कि चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर मुस्लिम समुदाय में धार्मिक अधार पर ध्रुवीकरण बढ़ेगा.

इसका सबसे ज्यादा फ़ायदा समाजवादी पार्टी को मिल सकता है.

दूसरी ओर मतदान के दिन मुस्लिम समुदाय गोलबंदी में दिखती है तो आखिरी क्षणों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सहयोगी संगठन हिन्दुओं को भाजपा की तरफ झुकाने का प्रयत्न करेंगे.

ख़ासकर उन इलाक़ों में जहाँ हिन्दू, मुस्लिम आबादी मिली-जुली है.