रविवार, 01 अप्रैल, 2007 को 15:34 GMT तक के समाचार
रेणु अगाल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
उत्तर प्रदेश चुनाव में कांग्रेस पार्टी की नज़रें और उम्मीदें राहुल गांधी पर टिकी हैं.
राहुल गांधी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश का धुँआधार दौरा किया. जिस तेज़ी से उनका काफ़िला बढ़ा क्या उसी तेज़ी से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जनाधार भी बढ़ेगा?
अहम सवाल ये भी है कि क्या 2002 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में 25 सीटों पर सिमटी कांग्रेस का उद्धार करने के लिए जिस मज़बूत नेतृत्व और राजनीतिक परिपक्वता की ज़रूरत है वो राहुल गाँधी में है?
कांग्रेस पार्टी राहुल के चुनावी अभियान को 'रोडशो' का नाम दिया. इसके बारे में राहुल गांधी का कहना है," चाहे आप इसे सेमीफ़ाइनल मानें या फ़ाइनल मानें लेकिन मेरे ख़याल से उत्तर प्रदेश में बदलाव आना चाहिए."
दौरे पर राहुल गाँधी के साथ रहे कांग्रेस सांसद राशिद अल्वी इन चुनावों को उनका 'लिटमस टेस्ट' नहीं मानते. लेकिन राशिद अल्वी दूसरे कांग्रेसी नेताओं की तरह राहुल का जादू चलने का विश्वास नहीं करते.
उनका कहना है,"मैं नहीं मानता कि ये राहुल गांधी का लिटमस टेस्ट है. आज तक देश की राजनीति में किसी का लिटमस टेस्ट नहीं हुआ तो आप इन चुनावों को राहुल गांधी का लिटमस टेस्ट क्यों मानते हैं. लेकिन जिस तरह से वो सड़क पर उतरें हैं उससे उत्तर प्रदेश में बदलाव ज़रूर आएगा."
चुनौती
उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय का मानना है कि जब उत्तर प्रदेश को कांग्रेस की वाकई ज़रूरत थी- सूखे और बीमारियों का प्रकोप था तब अमेठी के ये सांसद कहीं मरहम लगाने नहीं पहुँचे थे.
उन्होंने कहा कि जब ज़मीन से जुड़े मुद्दों, किसानों के मुद्दों को उठाने का वक़्त आया तो ये काम वीपी सिंह ने किया. असल में उत्तर प्रदेश की सियासत में फ़िर से एक ताक़त बनकर उभरने के लिए कांग्रेस को कई मौके मिले लेकिन पार्टी ने सभी मौके गवाँ दिए.
राम बहादुर राय ने कहा," कांग्रेस यूपी के लोगों की ज़िंदगी में कहीं है ही नहीं और राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का भला कर सकें इतना पुरुषार्थ उनमें नहीं है."
अपने रोड शो में अगर राहुल ख़बरों में आए तो इस बात पर कि उनके पापा ने उनकी मम्मी से कहा था कि वो होते तो बाबरी मस्ज़िद विध्वंस नहीं होता.
सोनिया गांधी की जीवनी लिखने वाले और कांग्रेस पार्टी पर नज़र रखने वाले पत्रकार राशिद किदवई इस बयान पर उभरे बवाल को बेमानी मानते हैं.
उनका कहना है कि न ये बयान पहली बार आया है और न इसमें कुछ नया है. हाँ, लोगों की यादाश्त ज़रूर कमज़ोर है.
पर लाख टके का सवाल तो ये है कि क्या इन विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी का जादू चल पाएगा?
अमेठी से युवा सांसद राहुल गांधी की युवा ऊर्जा से कांग्रेसी कार्यकर्ता परिचित हैं लेकिन सभी जानते हैं कि चाहे राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के इन चुनावों में शुरू से अंत तक सभी निर्णय ले रहे हों, सभी बारीकियों को समझ रहे हों फ़िर भी इन चुनावों में कांग्रेसियों को किसी बड़ी जीत की आशा नहीं है.
आशा अगर है भी तो चुनाव बाद के समीकरण में अहम भूमिका निभाने की. लेकिन ग़ौर करने की सबसे बड़ी बात तो ये है राहुल मैच जिताने वाले कप्तान साबित होते हैं कि नहीं.