शनिवार, 31 मार्च, 2007 को 11:44 GMT तक के समाचार
रेणु अगाल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत की अध्यक्षता में 3-4 अप्रैल को दिल्ली में होने वाले सार्क सम्मेलन की ख़ास बात अफ़ग़ानिस्तान का सार्क के नए सदस्य के रूप में जुड़ना होगा.
किसी भी क्षेत्रीय सहयोग संगठन की सफलता मापने का पैमाना शायद इसके सदस्य देशों के बीच आपसी संपर्क तय करता है. फिर चाहे यह आम लोगों के बीच हो या राजनयिक स्तर पर.
सार्क भी इससे अछूता नहीं है और विज्ञान भवन में होने वाली इस बैठक में अफ़ग़ानिस्तान नए सदस्य के रूप में शामिल होगा.
भारत के विदेश सचिव शिवशंकर मेनन का कहते हैं, "ये महत्वपूर्ण शिखर बैठक होगी, जो उपमहाद्वीप को एक-दूसरे से जोड़ने के साथ बाकी दुनिया से भी जोड़ने का काम करेगी. अफ़ग़ानिस्तान औपचारिक तौर पर सार्क संगठन में शामिल होगा, जो हमारे लिए खुशी की बात है."
विस्तार के मायने
ये पहली बार होगा कि सार्क बैठक में अमरीका, यूरोपीय संघ, चीन, दक्षिण कोरिया और जापान पर्यवेक्षक के रूप में जुड़ेंगे.
बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका के बाद अफ़ग़ानिस्तान के सार्क से जुड़ने के आख़िर फायदे क्या हैं?
इस पर अफ़ग़ानिस्तान में भारत के राजदूत रह चुके आईपी खोसला का कहना है, "मेरे ख्याल से इसका फायदा सभी सार्क देशों को होगा. अफ़ग़ानिस्तान की कोशिश तो लंबे समय से सार्क में शामिल होने की थी. इससे हमारी पहुँच मध्य एशिया तक हो जाएगी. अफ़ग़ानिस्तान और भारत के बीच तेल और गैस पाइपलाइन बनाना चाहें तो उस स्थिति में काम आसान हो जाएगा."
ईरान की सार्क में पर्यवेक्षक बनने की रुचि पर भी बैठक की नज़र रहेगी.
व्यापार पर ज़ोर
एक क्षेत्रीय संगठन के आर्थिक रिश्ते कैसे हैं, ये भी इसकी सफलता का एक पैमाना होता है.
ज़्यादातर सभी सार्क देशों की अर्थव्यवस्थाएँ अच्छे हाल में हैं.
आर्थिक विकास की दर पाँच फ़ीसदी से अधिक रही है, लेकिन व्यापार की बात करें तो सार्क देशों के बीच जहाँ यह मात्र पाँच प्रतिशत है, वहीं आसियान देशों में 26 फ़ीसदी, नाफ़्टा और यूरोपीय संघ के देशों के बीच 25 फ़ीसदी है.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और ऑव्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रोफेसर
एसजे मुनी का कहना है, "दो बातें हैं. अगर सार्क के व्यापार में चार पाँच वर्षों में वृद्धि हुई है. दूसरी बात ये है कि व्यापार का मसला हर देश की आर्थिक हालत से जुड़ा है. दक्षिण एशिया के देश जैसे भूटान, नेपाल और श्रीलंका आर्थिक रूप से इतने विकसित नहीं है जितने आसियान या यूरोप के देश. इसलिए ये उम्मीद करना की उनका व्यापार बहुत बढ़ जाएगा, स्वाभाविक नहीं होगा. गुंजाइश तो बहुत है, लेकिन व्यापार में ये वृद्धि यूरोप के बराबर होगी, ये उम्मीद बेमानी है."
मुद्दे
संचार, संस्कृति, ग़रीबी उन्मूलन, रेल और सड़क मार्ग जोड़ने जैसे कद़मों के अलावा इस शिखर बैठक में सार्क विकास कोष के कार्यान्वयन की चर्चा होगी.
साथ ही इस बैठक में और इसके बाद होने वाली द्विपक्षीय वार्ताओं में आतंकवाद चर्चा का विषय रहेगा.
शायद श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान आदि की आंतरिक समस्याओं की कुछ छाया यहाँ भी नज़र आए.
सार्क की स्थापना 22 साल पहले हुई थी और ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इससे असंतुष्ट हैं.
यही वजह है कि शिखर सम्मेलन के शुरू होने के पहले दिल्ली में 'इमेजिन साउथ एशिया' सम्मेलन हुआ.
इसमें सार्क देशों के कई पूर्व विदेश सचिवों ने भाग लिया.
पाकिस्तान के पूर्व विदेश सचिव अकरम ज़ाकी का कहना था, "हमारा ख़्याल ये है कि इंसाफ और लोगों के अधिकारों की बुनियाद पर फ़ैसले होने चाहिए. निजीकरण और भूमंडलीकरण का जो विदेशी एजेंडा हमारे यहाँ आ गया है, उसका आम आदमी को लाभ नहीं हो रहा है. ठीक है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ रही है, लेकिन महँगाई बढ़ रही है और लोगों का रोज़गार छिन रहा है. ऐसे इंतज़ाम होने चाहिए कि संसाधनों का इस्तेमाल आम लोगों के फायदे के लिए हो."
सार्क सम्मेलन की सफलता इस पर टिकी है कि बातों से आगे बढ़ महत्वपूर्ण बातों को अमली जामा पहनाया जाए.
विश्व समुदाय इस संगठन को बहुत महत्व दे रहा है और अब ये सार्क देशों पर है कि वह इस ढंग से उभरे कि इसकी आवाज़ दुनिया में कोई न नकार पाए.