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बुधवार, 28 मार्च, 2007 को 12:18 GMT तक के समाचार

नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर

अकबर के ज़माने की देग़ की मरम्मत

अजमेर स्थित ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में मुगल बादशाह अकबर की ओर से भेंट की गई बड़ी देग़ यानी विशाल कड़ाह के नीचे का हिस्सा ख़राब हो चुका है और इसकी मरम्मत के लिए कारीगर बुलाए गए हैं.

इस देग़ में श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद बनाया जाता है जिसे तबर्रूक कहते हैं. इसमें एक साथ हज़ारों लोगों के लिए तबर्रूक बनाया जाता है.

दरगाह के नाज़िम अहमद रज़ा ने बीबीसी को बताया के देग़ की मरम्मत के लिए सिद्धहस्त कारीगरों का एक दल बड़ौदा से अजमेर पहुँच गया है.

कारीगरों ने देग़ का मुआयना करने के बाद कहा है कि इसका पैंदा यानी नीचे का हिस्सा ख़राब हो चुका है.

अब ऊपर के ढाई फीट को छोड़कर नीचे के पूरे हिस्से की मरम्मत की जा रही है.

आठ टन लोहा लगेगा

रज़ा कहते हैं, "मरम्मत में आठ टन लोहा लगेगा. हमारा प्रयास है कि देग़ का मौलिक स्वरूप बना रहे क्योंकि आस्था का प्रश्न भी है.''

दरगाह प्रबंधन ने स्टील के इस्तेमाल का इरादा छोड़ दिया है. देग़ की मरम्मत के लिए जहाज़ों में काम आने वाले लोहे का प्रयोग किया जाएगा.

सदियों तक अक़ीदतमंदों की श्रद्धा सामग्री स्वीकार करते-करते अब इस देग़ के ढाँचे का 80 प्रतिशत तक क्षरण हो चुका है.

दरगाह में बुलंद दरवाजे के दाएं ओर स्थित बड़ी देग़ में मीठे चावल, सूखे मेवे, मसाले और घी से प्रसाद तैयार किया जाता है.

देग़ में यह सामग्री किसी श्रद्धालु की भेंट पर तैयार की जाती है. अक्सर ज़ायरीन या श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर देग़ में तबर्रूक पकाने का निवेदन करते हैं.

बादशाह जहाँगीर ने छोटी देग़ भेंट की थी जो अब भी वहाँ मौजूद है. बड़ी देग़ में 4800 किलोग्राम और छोटी देग़ में 2400 किलोग्राम सामग्री पकाई जाती है.

दरगाह को सात करोड़ रुपए की सालाना आय होती है.

मुगल बादशाह अकबर की इस दरगाह में गहरी आस्था थी. अपनी मन्नत पूरी होने पर एक बार अकबर ने आगरा से अजमेर तक पैदल चलकर दरगाह पर मत्था टेका था.

सैकड़ों साल बाद मुग़लिया दौर के इस देग़ की मुकम्मल मरम्मत की जा रही है और उम्मीद है कि मरम्मत के बाद भी इसमें बनने वाले तबर्रूक का पुराना स्वाद बरकरार रहेगा.