शुक्रवार, 23 मार्च, 2007 को 15:05 GMT तक के समाचार
सलमान रवि
बीबीसी, संवाददाता, राँची
झारखंड की राजधानी राँची में विस्थापन और एसईज़ेड के ख़िलाफ़ सम्मेलन में सरकार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीच साझा करारों को रद्द करने की माँग की गई है.
सम्मेलन में शिरकत कर रहे लगभग 150 संगठनों के 500 से ज़्यादा प्रतिनिधियों ने विस्थापन को बढ़ावा देने वाले क़ानूनों मसलन भारतीय फिशरीज़ अधिनियम, भारतीय वन अधिनियम, भारतीय खनिज अधिनियम को भी निरस्त करने की माँग की.
राँची में दो दिनों यानी 22-23 मार्च को आयोजित इस सम्मेलन के बाद एक अखिल भारतीय संगठन का गठन किया गया है.
इसे विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन के नाम से जाना जाएगा.
विरोध
यह भी तय किया गया है कि विस्थापन के ख़िलाफ़ चरणबद्ध आंदोलन चलाया जाएगा, जिसके तहत संसद के समक्ष प्रदर्शन किया जाएगा.
सम्मेलन में भाग ले रहे रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट के जीएन साईबाबा ने बीबीसी को बताया कि इस प्रदर्शन में देशभर के कलाकार और कार्यकर्ता जुटेंगे शामिल होंगे. हालाँकि अभी प्रदर्शन की तारीख तय नहीं की गई है.
सम्मेलन में यह भी तय किया गया कि विस्थापन के ख़िलाफ़ प्रचार अभियान को और तेज़ किया जाए. इसके अलावा इस साल अक्टूबर में 24 घंटे का 'भारत बंद' बुलाने की भी घोषणा की गई.
सम्मेलन के समापन पर राँची उदघोषणा भी जारी गई, जिसमें 'विनाश नहीं, विपन्नता नहीं, विस्थापन नहीं, मौत नहीं' और 'हो बदलाव- समानता और न्याय आधारित' जैसे नारे भी बुलंद हुए.
विकास मॉडल
सम्मेलन में भाग ले रहे संगठनों ने विकास के वर्तमान मॉडल को यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि यह 'एकाधिकार के लिए बाज़ार खोलने के अलावा और कुछ नहीं है.'
पूर्व केंद्रीय आदिवासी कल्याण आयुक्त बीडी शर्मा ने बीबीसी को बताया कि विकास के इस मॉडल से परंपरागत हस्तशिल्प नष्ट हो गए हैं.
उन्होंने कहा, "देहाती क्षेत्र में मशीनी माल की बाढ़ आ गई है और इससे व्यापक बेरोज़गारी पैदा हो रही है."
सम्मेलन में विकास के ऐसे वैकल्पिक मॉडल का आहवान किया गया जो जनपक्षीय हो और साम्राज्यवाद की ग़ुलामी से मुक्त आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था पर टिका हो.
सम्मेलन के बाद जारी दस्तावेज में माँग की गई कि विकास की नीति लोगों के हित को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए, इनकी कीमत पर नहीं.