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रविवार, 18 मार्च, 2007 को 18:58 GMT तक के समाचार

अल्ताफ़ हुसैन
बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर

पीडीपी-कांग्रेस गठबंधन में फूट

कश्मीर से सेना हटाने का जो प्रस्ताव पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने रखा था उसको लेकर जम्मू-कश्मीर में सत्तारूढ़ गठबंधन में फूट पड़ गई है.

पूर्व मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडपी)सरकार से अलग होने के बारे विचार कर रही है.

लेकिन इससे सरकार के गिरने का तत्काल कोई ख़तरा नहीं है.

नवंबर 2005 में कांग्रेस के नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद ने पहले से तय फॉर्मूले के आधार पर मुफ़्ती मोहम्मद सईद की जगह मुख्यमंत्री का पद संभाला है और तब से दोनों पार्टियों के बीच संबंध कभी ख़ुशगवार नहीं रहे हैं.

मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती को इससे परहेज नहीं है कि उनकी पार्टी सरकार में रहते हुए भी विपक्ष की भूमिका निभाए.

उनका कहना है कि वह अपने पिता के शासनकाल में भी ऐसा ही करती थीं.

कांग्रेस और पीडीपी के बीच मौज़ूदा विवाद का कारण ये है कि मुफ़्ती मोहम्मद सईद राज्य में सेनाएँ कम करने और सेना को प्राप्त विशेषाधिकार वापस लेने की माँग कर रहे हैं.

बहिष्कार

पीडीपी ने इस मुद्दे पर राज्य के मंत्रिमंडल की बैठक में चर्चा करने का प्रस्ताव दिया था लेकिन कांग्रेस ने उनकी ये माँग अस्वीकार कर दी जिसके बाद पीडीपी के मंत्रियों ने अब तक तीन बार मंत्रिमंडल की बैठक का बहिष्कार किया है.

पिछले गुरुवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मुफ़्ती मोहम्मद सईद के एक पत्र के जवाब में स्पष्ट कर दिया कि जम्मू-कश्मीर में सैनिकों की संख्या कम किए जाने का समय अभी नहीं आया है.

प्रधानमंत्री ने अपने पत्र में गुप्तचर एजेंसियों की रिपोर्टों का उल्लेख किया है कि गर्मियों में जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा के पार से दोबारा घुसपैठ के प्रयास होंगे और राज्य में अलगाववादी हिंसा में बढोतरी की आशंका है.

पीडीपी ने प्रधानमंत्री के इस जवाब के बाद अपनी आगे की नीति तैयार करने के लिए 25 मार्च को राजनीतिक मामलों की समिति की बैठक बुलाई है.

यदि पीडीपी सरकार से अलग हो जाती है तो सरकार को तत्काल कोई ख़तरा नहीं होगा क्योंकि यह लगभग तय है कि विपक्ष की भूमिका निभा रही और विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी नेशनल कॉंफ्रेंस आज़ाद सरकार को गिरने नहीं देगी.

नेशनल कॉंफ्रेंस के नेता मुफ़्ती मोहम्मद सईद से कई बातों का बदला लेना चाहते हैं.

विकल्प

पीडीपी के अंदर एक राय यह भी है कि सरकार से अलग होने के बाद सरकार को बाहर से समर्थन दिया जाए ताकि नेशनल कॉंफ्रेंस को किसी प्रकार का लाभ नहीं मिले.

कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने सेना हटाने और सेना के विशेषाधिकार वापस लेने के मुद्दे पर कांग्रेस के साथ टकराव का रास्ता इसलिए चुना है क्योंकि उनकी नज़र अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों पर है.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि श्री सईद ने वर्ष 2002 का चुनाव अर्द्ध अलगाववादी लाइन पर लड़ा था और इस बार भी सईद इसी प्रयोग को दोहराना चाहते हैं.

लेकिन पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस बार सईद की यह रणनीति सफल नहीं होगी.

वरिष्ठ पत्रकार राशिद अहमद का कहना है कि मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने पिछले चुनाव के दौरान जो कुछ भी वादे किए थे उनको पूरा करने में वे नाक़ाम रहे.

टास्क फोर्स का मुद्दा

अहमद कहते हैं, "मुफ़्ती सईद ने अपने शासनकाल में ऐलान किया था कि मानवाधिकारों के हनन के लिए बदनाम पुलिस की विशेष टास्क फोर्स को ख़त्म कर दिया गया है लेकिन अब आम लोगों को भी पता चल गया है कि विशेष टास्क फोर्स न केवल मौज़ूद है बल्कि इसके अधिकारी आम लोगों को फ़र्जी संघर्षों में मारते भी रहे हैं."

ध्यान रहे पिछले दिनों कई लोगों की लाशों को क़ब्रों से निकाला गया है जिन्हें टास्क फोर्स के अधिकारियों ने विदेशी चरमपंथी बताकर फ़र्जी मुठभेड़ों में मार डाला था.

कई हलकों में यह धारणा भी पाई जाती है कि मुफ़्ती सईद को इसकी भनक थी कि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर से सेना हटाने के बारे में सैद्धांतिक रूप से सहमति हो गई है इसलिए उन्होंने विसैन्यीकरण का नारा देकर इसका श्रेय लेने का प्रयास किया.

इन हलकों का कहना है कि तीन वर्ष पूर्व श्रीनगर और मुजफ़्फ़राबाद के बीच जो बस सेवा शुरु हुई थी उसे भी मुफ़्ती ने अपनी उपलब्धि बताने का प्रयास किया था और इसके लिए उन्होंने जगह-जगह होर्डिंग खड़ी की थी जिन पर मुजफ़्फ़राबाद तक की दूरी भी लिखी थी.

अलगाववादी नाराज़

दिलचस्प बात यह है कि मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने सेना हटाने की जो माँग की है उससे अलगाववादी नेता भी नाराज़ हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सईद उनके मंच को भी झटकने का प्रयास कर रहे हैं.

यही कारण है कि मीरवाईज़ उमर फ़ारुक़ ने पिछले दिनों घोषणा कर दी थी कि भारत और पाकिस्तान के बीच सेना हटाने के बारे में सहमति हो चुकी है और अब इसकी रूपरेखा तय की जा रही है.

मीरवाईज़ के सहयोगियों का कहना है कि उन्होंने विवश होकर अनुचित समय पर इस करार को सार्वजनिक कर दिया और इसीलिए प्रधानमंत्री ने तुरंत इसका खंडन कर दिया.