मंगलवार, 13 मार्च, 2007 को 06:24 GMT तक के समाचार
पाकिस्तान के निलंबित मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी ने उन पर लगे पद के दुरुपयोग के आरोपों से इनकार किया है.
वे मंगलवार को इस्लामाबाद के सुप्रीम कोर्ट में एक पैनल के सामने पेश हुए. इस मामले की सुनवाई शुक्रवार तक स्थगित कर दी गई है.
सर्वोच्च न्यायिक परिषद इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी के ख़िलाफ़ पद के दुरुपयोग के आरापों की जाँच कर रहा है.
उधर पाकिस्तान के सूचान मंत्री मोहम्मद अली दुर्रानी ने बीबीसी को बताया है कि परिषद ने मीडिया से कहा है कि इफ़्तिख़ार मोहम्मद की सुनवाई की रिपोर्टिंग न की जाए.
मंगलवार को जब इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी को सुप्रीम कोर्ट लाने के लिए आधिकारिक कार भेजी गई तो उन्होंने कार में बैठने से इनकार कर दिया और पैदल ही चलने लगे.
लेकिन पुलिस ने उन्हें रोका और इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी को एक अन्य आधिकारिक इमारत में ले गए. बाद में उन्हें ज़बरदस्ती कार में बिठाकर सुप्रीम कोर्ट लाया गया.
कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी के साथ उनके कई समर्थक और वकील सुप्रीम कोर्ट पहुँचे. ये लोग मुशर्रफ़ जाओ के नारे लगा रहे थे.
इन लोगों की ये भी माँग थी कि सुनवाई सार्वजनिक तौर पर की जाए.
विरोध प्रदर्शन
नौ मार्च को राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने मुख्य न्यायाधीश चौधरी को पद का दुरुपयोग करने के आरोप में निलंबित कर दिया था.
निलंबन की इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ वकीलों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है और मंगलवार को दूसरे दिन भी प्रदर्शन कर रहे हैं.
वकीलों ने इसे गैरक़ानूनी बताते हुए पूरे पाकिस्तान में सोमवार को अदालतों का बहिष्कार किया था.
सोमवार को राजधानी इस्लामाबाद में वकील काली पट्टी बाँधकर अदालत पहुँचे, और कामकाज नहीं किया.
लाहौर में पुलिस ने प्रदर्शनकारी वकीलों पर डंडे बरसाए, जिससे 20 से ज़्यादा वकील घायल हो गए.
तनाव
बीसीसी संवाददाता के मुताबिक़ कई लोगों का मानना है कि मुख्य न्यायाधीश को इसलिए निलंबित किया गया क्योंकि उन्होंने ऐसे मामले उठाए, जिनमें सरकार को ही कठघरे में खड़ा किया गया था.
इनमें कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं के ग़ायब होने के मामले भी हैं. जिनके बारे में कहा जाता है कि इन्हें सुरक्षा बलों ने कथित रूप से हिरासत में रखा था.
इस्लामाबाद से बीबीसी संवाददाता बारबारा प्लेट का कहना है कि पुलिस और वकीलों में संघर्ष से ये साबित होता है कि इस मामले में तनाव बढ़ता जा रहा है.
सरकार ने आरोपों के कथित दुरुपयोग के बारे में अभी तक सार्वजनिक तौर पर कोई विवरण नहीं दिया है.
वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, विपक्षी पार्टियों और कुछ जजों ने राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के इस क़दम की आलोचना की है और कहा है कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए तगड़ा झटका है.