शनिवार, 10 मार्च, 2007 को 14:10 GMT तक के समाचार
रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी के उत्तर प्रदेश संवाददाता
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच प्रस्तावित सेतु समुद्रम नहर परियोजना का मार्ग बदलने की मांग रखी है.
संघ का कहना है कि परियोजना के वर्तमान स्वरुप से 'भगवान राम द्दारा निर्मित रामसेतु की धरोहर' नष्ट हो जाएगी.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सर्वोच्च नीति निर्धारक प्रतिनिधि सभा के एजेंडे में इस बार राममंदिर की जगह रामसेतु का मुद्दा छाया रहा.
प्रतिनिधि सभा ने प्रस्ताव पारित करके सरकार से मांग की है कि सेतु समुद्रम नहर परियोजना के लिए कोई वैकल्पिक मार्ग चुना जाए, जिससे रामसेतु को नष्ट होने से बचाया जा सके.
संघ के प्रवक्ता अधीश ने कहा, "अगर सेतु समुद्र नहर परियोजना का रास्ता नहीं बदला गया तो पूरा हिंदू समाज आंदोलन करेगा."
संघ की प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच समुद्र में यह पुल हज़ारों साल से मौजूद है. विभिन्न अभिलेखों में इसे आदम पुल कहा गया है. प्रस्ताव के अनुसार इस बात के भी प्रमाण हैं कि 15वीं शताब्दी तक लोग इस सेतु से होकर समुद्र पार करते थे.
सवालों के जवाब में अधीश ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को एक स्थानीय अदालत को सौंप दिया है जो परियोजना से जुड़े विभिन्न पहलुओं का परीक्षण कर रही है.
अन्य प्रस्ताव
एक अन्य प्रस्ताव में संघ ने '1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम' की 150वीं जयंती मनाने के भारत सरकार के निर्णय का स्वागत किया है. संघ ने अपने स्वयंसेवकों का आहवान किया कि 'वे 1857 की क्रांति को विविध कार्यक्रमों के माध्यम से जीवित रखें.'
आरएसएस प्रतिनिधि सभा की बैठक रविवार को समाप्त होगी. बैठक में देश की आर्थिक स्थिति और अन्य विषयों पर भी प्रस्ताव पारित किए जाएँगे.
संघ की प्रतिनिधि सभा की बैठक शुक्रवार को वेदमंत्रों के सस्वर पाठ से शुरू हुई. पहले सत्र में मुख्य रूप से संघ के सरकार्यवाह या महासचिव मोहनराव भागवत ने अपनी वीर्षिक रिपोर्ट पेश की.
इस रिपोर्ट में देश भर में संघ की शाखाओं का जाल फैलाने का आहवान किया गया है. वार्षिक रिपोर्ट में यह आरोप दोहराया गया है कि भारत में अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण हो रहा है और हिंदुओं की अवहेलना की जा रही है.
भागवत ने अपनी रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया कि कश्मीर में अलगाव और चरमपंथ समर्थक शक्तियों के साथ अंदर ही अंदर बातचीत चल रही है. देश की आर्थिक नीति को किसान और गरीबों की विरोधी तथा धनवानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मददगार बताया गया है.