मंगलवार, 27 फ़रवरी, 2007 को 09:55 GMT तक के समाचार
पीएम तिवारी
कोलकाता से
"हमें भी मनोरंजनकर्मी का दर्जा और उनको मिलने वाला अधिकार मिलना चाहिए ताकि हम समाज में इज़्ज़त के साथ जी सकें..." "यौन संतुष्टि हमारा अधिकार है. आखिर हम अपराधी की तरह क्यों रहें..." "हम भी कलाकार हैं और अपनी कला से लोगों का दिल बहलाते हैं..."
इसी तरह के कई सवालों और नारों के साथ पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में मनोरंजन कर्मियों का एक अखिल भारतीय सम्मेलन हो रहा है जिसमें देश भर से हजारों प्रतिनिधि एक सप्ताह तक इन मुद्दों पर चर्चा करेंगे.
अपनी तरह के इस सबसे बड़े व पहले सम्मेलन के दौरान यौन संतुष्टि और अधिकारों पर चर्चा के लिए जो जानी-मानी हस्तियाँ इस सम्मेलन में शिरकत करेंगी उनमें फिल्मकार गौतम घोष, महेश भट्ट, रितुपर्णो घोष व मेधा पाटकर के अलावा समाज के विभिन्न तबकों के लोग शामिल हैं.
हिमायत
कोलकाता में एशिया के सबसे बड़े रेडलाइट इलाके सोनागाछी में काम करने वाली संस्था दुर्बार महिला समन्वय समिति की पहल पर फ़रवरी के पहले सप्ताह में विनोदिनी श्रमिक यूनियन (बीएसयू) का गठन किया गया था.
इसमें यौनकर्मियों के अलावा मनोरंजन से जुड़े विभिन्न वर्गों मसलन छऊ, नाटक, सिनेमा व विभिन्न नर्तकियों को शामिल किया गया था.
रविवार से शुरू हुए सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों और अतिथियों ने यौनकर्मियों को मनोरंजनकर्मी का दर्जा देकर उनको भी तमाम सहूलियतें देने की ज़ोरदार वकालत की.
सम्मेलन में शिरकत करने आए भारत में यूएनएड्स के संयोजक डा. डेनिस ब्राउन कहते हैं, "यौनकर्मियों के ग्राहकों को अपराधी माना जाता है लेकिन अगर यौनसंतुष्टि के अधिकार को क़ानूनी मान्यता मिल जाए तो इन दोनों के संबंध पूरी तरह बदल जाएंगे."
डेनिस ब्राउन कहते हैं, "यौनकर्मियों को समुचित दर्जा मिलने पर एड्स की रोकथाम में भी सहायता मिलेगी. इन यौनकर्मियों को श्रमिक का दर्जा देकर तमाम अधिकार दिया जाना चाहिए.
दुर्बार महिला समन्वय समिति के मुख्य सलाहकार समरजीत जाना कहते हैं, "अगर यौन संतुष्टि के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल कर लिया जाए तो ग्राहकों के साथ यौनकर्मियों के हितों की भी रक्षा होगी. मनोरंजन के क्षेत्र में सालाना 20 फ़ीसदी की दर से विकास हो रहा है. इसलिए इस क्षेत्र के लिए विशेष श्रम कानून बनाना ज़रूरी है. आज या कल, सरकार को इन यौनकर्मियों को मनोरंजनकर्मी का दर्जा देना ही होगा."
दिल्ली के वकीलों के संगठन लॉयर्स कलेक्टिव के प्रवक्ता आनंद ग्रोवर कहते हैं, "मनोरंजन जीवन की मूल ज़रूरत है और इससे जुड़े लोगों को भी समाज में इज़्ज़त के साथ जीने का हक़ है. अब इस हक़ को क़ानूनी जामा पहना दिया जाना चाहिए. यौनकर्मी व बार-डांसर भी मनोरंजन कर्मी हैं. वे समाज से अलग-थलग क्यों रहेंगी?"
क़ानूनी मान्यता
कोलकाता के शेरिफ रथींद्रनाथ दत्त ने इस सम्मेलन का उदघाटन किया. उनका भी कहना था कि मनोरंजनकर्मियों को क़ानूनी मान्यता व श्रम अधिकार दिया जाए. वह कहते हैं क अगर यौनकर्मी नहीं होतीं तो समाज में सेक्स से जुड़े अपराध काफी बढ़ जाते. वे हजारों लोगों को यौन संतुष्टि मुहैया कराती हैं और इससे सेक्सजनित अपराधों पर नियंत्रण रखने में सहायता मिलती है.
मुंबई बार डांसर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष वर्षा काले कहती हैं, "हमारे सामने अपने हक़ के लिए एकजुट होकर लड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. इसकी शुरूआत इस सम्मेलन से ही होगी."
एड्सपीड़ितों के हित में काम करने वाली ब्रिटिश सामाजिक कार्यकर्ता आना कहती हैं कि यह एक अच्छी शुरूआत है. कानूनी मान्यता मिलने के बाद इस पेशे की बुराइयों को दूर करने में भी सहायता मिलेगी.
यौनकर्मी रह चुकी भारती दे कहती हैं, "हम देश भर के मनोरंजन कर्मियों को एक बैनर तले लाने का प्रयास कर रहे हैं ताकि अपने हक की लड़ाई मजबूती से लड़ सकें."
सोनागाछी में एक यौनकर्मी के पुत्र गोविंद साहा कहते हैं, "मेरी माँ भी दूसरे कलाकारों की तरह लोगों का मनोरंजन करती है. ऐसे में उसे समाज नफ़रत की नज़र से क्यों देखेगा? वह भी उसी सम्मान की हक़दार है जो किसी गायक या अभिनेता को मिलता है."
आंध्र प्रदेश से आई बालसम्मा और महाराष्ट्र से आई बार डांसर सुनीता भी अपने लिए अधिकार की माँग करती हैं.
भिन्न राय
लेकिन सब लोग इस सम्मेलन के साथ नहीं हैं. वाममोर्चा के अध्यक्ष व प्रदेश माकपा सचिव विमान बोस कहते हैं कि ‘लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने का सबको अधिकार है. इन मांगों पर केंद्र ही कोई फैसला कर सकता है. लेकिन यह सवाल उतना आसान नहीं है. कोई भी फैसला करते समय इससे जुड़ी पेचीदगियों को भी ध्यान में रखना होगा.’
मीडिया का एक हिस्सा भी इस सम्मेलन के खिलाफ है. कोलकाता के ज्यादातर भाषाई अखबारों में इस सम्मेलन के बारे में कोई रिपोर्ट नहीं छप रही है. छपती भी है तो सिंगल कालम में, भीतर के पन्नों पर.
सबसे ज़्यादा बिकने वाले एक भाषाई अखबार के वरिष्ठ संपादक नाम नहीं बताने की शर्त पर कहते हैं कि ‘यौनकर्मियों को समाज में शुरू से ही ओछी नज़रों से देखा जाता रहा है. अब इन मांगों को छापने से युवा पीढ़ी पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है. इसलिए हमने सम्मेलन की खबरों को नहीं छापने का फैसला किया है.’
वे कहते हैं कि ‘समाज के हित में अखबारों की एक बड़ी भूमिका है.’ सरकार समर्थक एक अन्य बांग्ला अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं कि ‘निजी तौर पर यौनकर्मियों की मांगों का समर्थन करने के बावजूद अखबारों में इस बारे में ज्यादा छापना उचित नहीं है.’
बांग्ला चैनलों का भी यही हाल है. उन्होंने एकाध मिनट के फुटेज दिखा कर ही इस खबर पर पूर्णविराम लगा दिया है.