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मंगलवार, 20 फ़रवरी, 2007 को 11:51 GMT तक के समाचार

घनश्याम पंकज
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक

उत्तराखंड की चाबी सपा-बसपा के हाथ!

एक ऐसे परिदृष्य की संभावना मतदान का दिन निकट आते-आते बलवती होती जाती है कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनो में से किसी को इस बार उत्तराखंड में सरकार बनाने के लिए स्पष्ट बहुमत नहीं मिले.

समाचार चैनलों के जो ताजा सर्वेक्षण आए हैं, उसमें से किसी ने भाजपा की ओर और किसी ने कांग्रेस को मामूली बढ़त की बात की है.

मगर इसमें से एक चैनल का निष्कर्ष सबसे चौंकाने वाला है कि मत प्रतिशत भले ही भाजपा का बढ़े, लेकिन सीटों की बढ़त कांग्रेस को ही मिलेगी.

जोड़तोड़

बढ़त किसी को भी मिले, तब भी सरकार गठित करने और उसे स्थिरता देने के लिए स्पष्ट बहुमत पाने को सपा और बसपा में से किसी एक का साथ कांग्रेस और भाजपा दोनो के लिए ज़रूरी हो सकता है.

मुलायम सिंह ने तो उत्तराखंड में एक जनसभा में दावा भी किया कि कोई भी सरकार हमारी मर्जी से ही बनेगी.

ऐसा माना जा रहा है कि डेढ से दो दर्जन सीटों पर बसपा-सपा के उम्मीदवार सफल हो सकते हैं.

मायावती और मुलायम सिंह के इस बाबत अलग-अलग अंतर्द्वद्व हैं. पहले बसपा की सोच का जायजा लें.

संघ परिवार के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ ने अपने ताजा अंक में कहा है कि पिछले चुनाव में बसपा ने उत्तराखंड के मैदानी इलाक़ों से सात सीटें जीतकर भाजपा की बहुमत पाने की संभावना को करारा झटका दिया था.

दलित मत

पत्र की राय में इस बार ऐसा न होने पाए इसके लिए पार्टी पहले ही काफी सक्रिय है.

मगर वस्तुस्थिति यह है कि अगर क्षेत्र की रुद्रपुर सीट को ही लें तो वहाँ दलितों के मत 15 प्रतिशत, प्रवासी बंगालियों के दस प्रतिशत, पहाड़ी मतदाताओं के छह प्रतिशत और सिखों के पाँच प्रतिशत मत हैं.

कहीं थोड़े, कहीं ज़्यादा अंतर के साथ मैदानी इलाक़ों के अन्य विधानसभा क्षेत्रों में भी दलित मतदाताओं की यही स्थिति है और नतीजों को प्रभावित कर सकने की उनकी क्षमता हर कहीं बरकरार है.

बसपा दावा तो ज़्यादा सीटों का कर रही है और इस बार दस से ज़्यादा सीटों पर उसे अपनी जीत का भरोसा है.

प्रतिस्पर्धी दलों की ‘कड़ी रेस’ में 70 सीटों वाली विधानसभा में इस संख्या का महत्व और भी बढ जाता है.

माया की मुश्किल

मायावती की कठिनाई यह है कि उनके लिए उत्तर प्रदेश की अहमियत उत्तराखंड से कहीं अधिक है और अगर वह कांग्रेस को समर्थन करती है तो उत्तर प्रदेश में उनके पत्ते वक़्त से पहले खुल जाएँगे, जो वे नहीं चाहती.

यदि भाजपा को उत्तराखंड में सरकार बनाने के लिए उनकी ज़रूरत होती है तब भी कठिनाई वही है.

भाजपा का साथ देने की स्थिति में उनकी मुसलिम नेताओं के ख़िलाफ़ एक कथित टिप्पणी से नाराज़ मुसलमान और भी ख़फा हो जाएँगे और उत्तर प्रदेश में उनकी धुर विरोधी पार्टी सपा को उनके ख़िलाफ़ ‘ठोस सामग्री’ मिल जाएगी.

मुलायम का अंतर्द्वंद्व

मुलायम सिंह का अंतर्द्वंद्व यह है कि जिस तरह केन्द्र की कांग्रेस सरकार उनको बर्खास्त करने के अभियान में लगी हुई है, ऐसे में यह सोचा भी नहीं जा सकता कि ज़रूरत पड़ने पर वो उत्तराखंड में कांग्रेस की सहायता करेगी.

वैसे पिछली बार सपा ने उत्तराखंड में 63 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें से 57 की जमानतें जब्त हो गई थी.

इस बार मुलायम सिंह भी दस सीटों के आसपास ही आशा रख रहे हैं. उत्तर प्रदेश के ताजा घटनाक्रम का यहाँ पार्टी के कार्यकर्ताओं के मनोबल पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है.

तमाम व्यस्तता के बीच मुलायम सिंह उत्तराखंड का चुनावी दौरा कर कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने की कोशिशों में हैं.

उत्तराखंड क्रांति दल भी कम के कम पाँच सीटों पर अपनी निश्चित दावेदारी जता रहा है.

महिला समर्थन अब भी उसके पास, केवल कार्यकर्ताओं का संगठन जो कभी हुआ करता था, बिखर गया है.

पासवान का दांव

इस बार चुनाव मैदान में नई उपस्थिति रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी है.

पासवान मुख्य रूप से मायावती के वोट बैंक में सेंध लगाने का काम कर रहे हैं और बसपा पर ब्राह्मणों तथा अन्य सवर्ण जातियों से मेलजोल बढ़ाने और रुपए-पैसे की राजनीति करने का आरोप लगाकर दलितों को अपनी और आकर्षित करने में लगे हैं.

पासवान के उम्मीदवार 21 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं और उनकी हरचंद कोशिश मायावती से कुछ सीटें छीन लेने की है.