सोमवार, 19 फ़रवरी, 2007 को 18:13 GMT तक के समाचार
सुशील झा
बीबीसी संवाददाता, पानीपत से
समझौता एक्सप्रेस के जले हुए दोनों डिब्बे अब आबादी से दूर कर दिए गए हैं लेकिन लोगों का आना जाना जारी है जो देखना चाहते हैं कि अब बचा क्या है.
बचा है बहुत कुछ. जली हुई लाशों की सड़ाँध, किसी बच्ची की पाजेब, किसी वज़ू करने वाले का लोटा, कांसे का ग्लास और किसी दुल्हन की साड़ी का फटा लाल टुकड़ा.
बाकी सब राख हो चुका है. पाकिस्तान पहुँच न पाए लोगों की उम्मीदें, रिश्तेदारों की आकांक्षाएँ, माँओं की दुआएँ सब कोयला हो गई हैं.
राख और कोयले से भरे इन डिब्बों में चढ़ने में डर लगता है लेकिन कई पत्रकार अंदर खड़े होकर अपना काम करने में लगे थे.
उन्हीं में एक मैं भी था लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि कहाँ से शुरु करुँ.
शायद मेरी दुविधा एक सज्जन ने समझी. वो ट्रेन में ही थे. बोले भाई साहब सामने देखिए जो लोटा पड़ा है जानते हैं किसका है मुसलमान का क्योंकि वो ही इससे वज़ू करते हैं.
उधर चूड़ियाँ पड़ी हैं ..... आगे देखिए थालियाँ पड़ी हैं.... शायद कुछ लोग खाना खा रहे थे देर रात.
सज्जन की बात सुनकर मैं कैमरा निकाल कर तस्वीरें उतारने की कोशिश करता हूँ और कैमरा अटक जाता है एक छोटी सी पाजेब पर जो शायद किसी बच्ची के पैर से निकल कर गिर गई थी.
मुश्किल
मुश्किल था बताना कि बच्ची का क्या हुआ होगा.
दूसरे डिब्बे के पास एक पुलिसवाला खड़ा था मुँह पर कपड़ा बाँधे हुए. मैंने उसे देखा और वो नज़रों में ही बोला साहब अभी भी लाशें हैं जिन्हें निकालना मुश्किल है. न जाने कौन बदनसीब है.
कितने हिंदू मरे, कितने मुसलमान. कितने हिंदुस्तानी, कितने पाकिस्तानी. राख, कोयला और बढ़ती सड़ाँध के बीच कौन पहचाने.
बाहर सभी इतना कह रहे थे कि सब इंसान ही तो थे.
ज़ेहन में एक सवाल घूम रहा था. किसने किया होगा. क्यों किया होगा. जवाब इसी बोगी में घूम रहे एक व्यक्ति ने दिया.
वो इतना ही बोले
आदमी से अब देखिए अब डर रहा है आदमी
मारता है आदमी और मर रहा है आदमी
समझ में आता नहीं कि क्या कर रहा है आदमी
कौन जाने आदमी को खा गई किसकी नज़र
आदमी से दूर होता जा रहा है आदमी