सोमवार, 19 फ़रवरी, 2007 को 13:11 GMT तक के समाचार
सुशील झा
बीबीसी संवाददाता
बदन पर कपड़ा नहीं है, धड़ है बस....एकदम जली हुई है. हम बचे हुए कपड़े रख लेते हैं- डायरी, पेन, फटा हुआ पासपोर्ट. . सब लाश के पास रख देते हैं....बस लोग पहचान लेते हैं.
ये कहना है अस्पताल में काम करने वाले रोहतास का. रोहतास समझौता एक्सप्रेस में हुए विस्फोट में मारे गए लोगों की लाशों को अलग करने में सुबह से लगे हुए हैं.
वे लाशों की पहचान करवाने में लोगों की मदद कर रहे हैं.
रोहतास का कहना है, " बहुत मुश्किल है पहचानना. कंधे से आगे हाथ नहीं, घुटने से नीचे पैर नहीं. बस पता चलता है मर्द है या औरत है.. इतना पता चलता है."
बच्चों की लाशों के बारे में बताते हुए रोहतास की आंखों से आँसू निकल पड़ते हैं जिसे वो चुपचाप पी लेते हैं.
एक बच्चे की लाश के बारे में वो बताते हैं," बारह-तेरह साल का एक बच्चा है. उसकी लाल रंग की टीशर्ट थी. उस पर दो लिखा हुआ था. मैंने वीडियो रिकॉर्डिंग की ताकि कोई देखे तो पहचान ले. बच्चा तो बच्चा होता है साहब जी."
'लाशें पहचानना मुश्किल काम'
रोहतास कहते हैं कि लाशों की शिनाख्त करवाना उनका काम है और एक साथ पचास लाशें देखकर भी घबराए नहीं थे.
सुबह से इस काम में लगे हुए रोहतास कहते हैं कि जैसे ही बच्चों के शव उन्होंने छुए तो उनकी हिम्मत जवाब दे गई.
वो कहते हैं," हम भी घर जाते हैं तो बच्चों को देखकर मन खुश हो जाता है. आज किसी का बच्चा मर गया है.. उसको कितना दुख होगा. यह समझ सकता हूँ मैं. "
लाशों के बारे में वो पूरी कोशिश करते हैं कि लोगों को भरपूर मदद करें.
रोहतास लाश के साथ मिला कोई भी सामान सहेज कर रख देते हैं ताकि पहचान आसान हो सके.
रिश्तेदारों की पहचान में दर दर भटकते लोगों से रोहतास को बहुत हमदर्दी है और वो कहते हैं कि इतनी झुलसी लाशें पहचानना किसी के लिए भी बहुत मुश्किल काम है.