रविवार, 18 फ़रवरी, 2007 को 12:00 GMT तक के समाचार
मोहनलाल शर्मा
दिल्ली से
लंबे समय से इस बात पर बहस चल रही है कि विवाहेत्तर संबंधों को अपराध माना जाए कि नहीं.
हाल ही में राष्ट्रीय महिला आयोग ने माँग की थी कि विवाहेत्तर संबंधों को अपराध न मानते हुए एक समाजिक समस्या के रूप में देखा जाए.
अब ऐसी ख़बरें मिल रही हैं कि माधव मेनन समिति ने भी महिला आयोग के इस अनुरोध को मान लिया है.
माधव मेनन समिति ने आपराधिक मामलों में न्याय पर राष्ट्रीय नीति का प्रारूप तैयार किया है.
सर्वोच्च न्यायालय की वकील इंदिरा जय सिंह ने इस बारे में बताया," मामला इसलिए भी सामाजिक है क्योंकि विवाहेत्तर संबंध की समस्या को दंड देकर नहीं रोका जा सकता. समाधान मुआवज़ा या तलाक़ देकर किया जा सकता है. लेकिन किसी को जेल में डालने का कोई मतलब नहीं है."
वर्तमान प्रावधान
क़ानून की नज़र में विवाह के बाद अवैध संबंध बनाने वाला व्यक्ति अपराधी है और उसे पाँच साल की सज़ा या ज़ुर्माना या फ़िर दोनों ही सजाएँ हो सकती हैं.
धारा 497 के तहत पति अपनी पत्नी पर अवैध संबंध का मामला नहीं चला सकता.
महिला आयोग की राय है कि विवाहेत्तर संबंधों में लिप्त महिला अपराधी नहीं बल्कि उसकी शिकार है.
हालांकि महिला आयोग का कहना है कि विवाहेत्तर संबंध के मामले को विश्वास तोड़ने का मामला मानकर सामाजिक समस्या की श्रेणी में डाला जाए न कि अपराध की.
उपाय
विवाहेत्तर संबंध के मसले पर सेंटर फ़ॉर सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना कुमारी का कहना है," आज तक इस क़ानून की ज़रूरत पड़ी ही नहीं. इसे अपराध मानना बेवकूफ़ी होगी. शादी के बाद अगर किसी अन्य से संबंध है तो उसे विश्वास तोड़ने की सज़ा मिलनी चाहिए."
रंजना कुमारी का यह भी कहना था कि विवाहेत्तर संबंध से जुड़े क़ानून को पुलिस के ज़ोर पर लागू कराना वैसे भी संभव नहीं है.
रिपोर्ट के मसौदे में कहा गया है कि इस तरह के सामाजिक आचरणों से निपटने के संभावित उपायों को खोजे बिना और उसके परिणामों को जाने बिना ही विवाहेत्तर संबंधों को आपराधिक श्रेणी में रख दिया गया है.
हालांकि विवाहेत्तर संबंधों को अपराध की श्रेणी से हटाकर सामाजिक समस्या की श्रेणी में डालने पर एक तरह से धीरे-धीरे सहमति बन रही है लेकिन अगर वर्तमान क़ानून में परिवर्तन होता है तो ये राष्ट्रीय सहमति के आधार पर होगा और इसे कई चरणों से गुज़रना होगा.