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शनिवार, 17 फ़रवरी, 2007 को 14:49 GMT तक के समाचार

रेणु अगाल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

चीनी विदेश मंत्री ने छोड़ी अमिट छाप

चीन के विदेश मंत्री ली ज़्याओशिंग हाल में भारत आए हुए थे. उनकी यात्रा भी कई विश्व नेताओं की तरह विदेश मंत्रालय पर नज़र रखने वालों के या फिर अख़बारों की छोटी रिपोर्टो में क़ैद हो जाती और फिर भुला दी जाती.

लेकिन ज़्याओशिंग ने ऐसी छाप छोड़ी कि उन्हें इतनी जल्दी भुलाया नहीं जा सकता. टेलीविज़न की इस दुनिया में वैसे भी 'बॉडी लैंग्वेज़' को बहुत तरजीह दी जाती है.

दो नेताओं ने कितनी गर्मजोशी से और कितनी देर तक हाथ मिलाया, उनके चेहरे पर मुस्कान थी या मानों सलवट, उनकी चाल में स्फूर्ति थी या यात्रा ख़त्म होने का इंतज़ार. इन सभी को आज शायद उतना ही नहीं तो काफ़ी अहम माना जाता है, जितना कि असल समझौतों-संधियों को माना जाता है.

फिर अगर नेता चीन से आया हो और दो बड़ी सभ्यताओं के साथ को याद करता हो तो फिर बात ही और होती है.

बिहार भी गए

ली ज़्याओशिंग ने कुछ समय आज के बिहार में बिताया और याद किया हुनसान को, जो तब के बिहार और नालंदा विश्वविद्यालय से प्रभावित होकर, एक दशक तक शिक्षा दीक्षा प्राप्त कर चीन लौटे थे और साथ ले गए बौद्ध धर्म की समझ.

तब चीन ने भारत से कुछ पाया था आज नालंदा के पुनरुत्थान के रूप में चीन ने भारत को तोहफा दिया है.

तोहफा देते वक़्त चीन के विदेश मंत्री ने सौगात देने वाले का दंभ नहीं पाला और नालंदा से चीन पहुँचे ज्ञान का आभार व्यक्त जताया.

कूटनीति के महारथी अगर चाणक्य ये सब देख रहे होते तो भी ली नीति से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते.

फिर दिल्ली में जिस तरह उन्होंने भारतीय विदेश मंत्री से हाथ मिलाया उससे लगा कि इनकी दोस्ती दशकों पुरानी रही होगी.

रूस और भारत के विदेश मंत्रियों के साथ दिल्ली के हैदराबाद हाउस में जब वे संवाददाता सम्मेलन में पहुँचे तो उन्होंने चीनी भाषा में मुखर्जी का मतलब पत्रकारों को बताया, 'आई एडमायर' यानी 'मैं प्रशंसक हूँ' और 'सरगेई' का मतलब होता है 'मैं बहुत कृतज्ञ हूँ.'

नपी-तुली भाषा नहीं

फिर क्या था हैदराबाद हाउस, जो कि नपी-तुली भाषा और भावहीन चेहरों का आदी हो चुका था, भी अचंभित रह गया.

ली ज़्याओशिंग ने चीन की एक समाचार एजेंसी की पत्रकार के सवाल के जवाब की शुरुआत भी कुछ यूं की-'नमस्ते'

उनका नमस्ते कहना और ये आशा व्यक्त करना कि शायद उस पत्रकार ने हिंदी सीखी हो... ने जितने अंक चीन को वहाँ मौजूद लोगों के दिलों में दिलवाए वो शायद बड़े-बड़े वादे भी नहीं दिलवा पाते.

ली की ही तरह हाल में भारत में चीन के दूत ने पत्रकारों को भारत-चीन मैत्री वर्ष की चर्चा के लिए जब घर बुलाया था तो वादा किया था कि वो उन्हें 'डंपलिंग' बनाना भी सिखाएंगे.

पत्रकार उस समय हैरान हो गए जब राजदूत और उनकी पत्नी ने न केवल आटा गूंथा बल्कि 'डंपलिंग' बनाकर पत्रकारों को खिलाया भी था.

शायद दुनिया भर में एक बड़ी ताक़त के रूप में उभरे चीन ने दुनिया भर में अपनी छवि बेहतर बनाने को भी उसी गंभीरता से लिया है, जितनी गंभीरता से उसने आर्थिक विकास को लिया है.

और जितनी सफलता 'मेड इन चाइना' को विश्व बाज़ार में मिली है. इसमें कोई शक नहीं कि ली जैसे नेता चीन को कूटनीतिक क्षेत्र में भी बड़ी शक्ति बना दें.