बुधवार, 14 फ़रवरी, 2007 को 14:35 GMT तक के समाचार
सुबीर भौमिक
बीबीसी संवाददाता, कोलकाता
भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल के कुछ ज़िलों में कैथोलिक पादरी उन ईसाईयों को दंडित कर रहे हैं जो बाल विवाह प्रथा को अब भी जारी रखे हैं.
जिन ईसाईयों ने बाल अवस्था में ही अपने बच्चों की शादी कर दी हैं उन्हें समुदाय से बाहर कर दिया गया है.
सज़ा के तौर पर ऐसे लोगों के बच्चों को ईसाई धर्म की दीक्षा देने से मना कर दिया गया है.
नादिया जिले के कैथोलिक पादरियों ने बताया कि उन्होंने कम से कम पन्द्रह ईसाई परिवारों के दीक्षा प्राप्त करने पर प्रतिबंध लगा दिया है.
नादिया और पड़ोस के दो अन्य ज़िले के कई दूसरे ईसाई परिवारों को भी बाल विवाह करवाने के लिए जुर्माना अदा करने के लिए कहा गया है.
नादिया जिले के बिशप जोसेफ़ गोम्स इस अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं.
बिशप गोम्स ने हालाँकि बताया कि जिन लोगों को दंडित किया गया है वे यदि सार्वजनिक तौर पर इसके लिए पश्चात्ताप करें तो उन्हें समुदाय में वापस स्वीकार कर लिया जाएगा.
कलकत्ता के कैथोलिक बुज़ुर्ग मानते हैं कि बिशप गोम्स का यह अभियान एक प्रयोग है जिसे आज़माया जाना चाहिए. साथ ही इन लोगों का कहना है कि वे इस अभियान के पूरे पश्चिम बंगाल में चलाने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है.
हालाँकि नादिया ज़िले के पादरियों को विश्वास है कि यहाँ के ईसाईयों के बीच बाल विवाह की प्रथा समाप्त करने में उन्हें सफलता अवश्य मिलेगी.
पश्चिम बंगाल में ईसाईयों की संख्या करीब दस लाख है . इनमें से कुछ भारत में सबसे पहले धर्म परिवर्तन करने वाले ईसाई परिवार भी हैं जिन्होंने ब्रितानी शासन के शुरुआती दिनों में ही धर्म परिवर्तन कर लिया था.
बाल विवाह पर भारत में कानूनी तौर पर प्रतिबंध है और इसके लिए दंड का प्रावधान है लेकिन ऐसा माना जाता है कि आज भी यह बड़े पैमाने पर गरीबों के बीच ये प्रथा प्रचलित है.