शनिवार, 10 फ़रवरी, 2007 को 12:32 GMT तक के समाचार
नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के पहली पंक्ति के सबसे वरिष्ठ नेता और विदेश विभाग के प्रमुख सीपी गुजरैल (कॉमरेड गौरव) ने कहा है कि नेपाल में आम चुनावों के बाद अगर माओवादी सरकार बनाते हैं तो नई विदेश नीति के तहत नेपाल भारत और चीन से बराबर दूरी बनाकर चलेगा.
उन्होंने कहा कि नेपाल का माओवादी आंदोलन सैद्धांतिक, राजनीतिक और विचारधारा के स्तर पर भारत के माओवादी आंदोलन का समर्थक तो है पर नेपाल के माओवादी आंदोलन का अभियान के स्तर पर भारतीय माओवादियों से कोई संपर्क नहीं है और भारत के संदर्भ में अपनी दिशा तय करने का काम यहाँ के आंदोलन को ख़ुद ही करना पड़ेगा.
भारतीय जेलों में 40 महीने की सज़ा काट चुके सीपी गुजरैल कुछ सप्ताह पहले ही रिहा किए गए हैं. पिछले दिनों वो बीबीसी के दिल्ली कार्यालय आए जहाँ बीबीसी संवाददाता पाणिनी आनंद ने नेपाल और भारत के संदर्भ में उनसे बातचीत की.
प्रस्तुत हैं कुछ प्रमुख अंश-
गुजरैल साहब, नेपाल में आम चुनावों के बाद अगर माओवादी सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ आते हैं तो आपकी विदेश नीति क्या होगी?
हम आशान्वित हैं कि बहुमत के साथ सरकार बनाएंगे. संविधान सभा की स्थापना के बाद जब हम सरकार बनाएंगे तब हमारी विदेश नीति पंचशील के सिद्धांत पर आधारित होगी. हम सभी देशों से अच्छे संबंध बनाएंगे.
इसके अलावा भारत और चीन हमारे पड़ोसी देश हैं. हम इनके बीच में स्थित हैं. ऐसे में पड़ोसी के महत्व को नकारा नहीं जा सकता. हम दोनों ही देशों से एक अच्छा रिश्ता बनाएंगे. दोनों से ही हम बराबर दूरी रखेंगे.
भारत के साथ मिलकर चीन को अलग करने का या चीन के साथ मिलकर भारत को अलग करने जैसा कोई भी काम हम नहीं करेंगे और ऐसा करने का विरोध करेंगे.
भारत का नेपाल में राजशाही के दौरान नेपाल से जो संबंध रहा है, उसे देखते हुए भविष्य में संबध कैसे होंगे?
देखिए, भारत और नेपाल के बीच जो सहज संबंध जैसा कुछ लग रहा है वो वास्तव में एक तरह से सहज तो है पर दूसरा पहलू यह है कि ये संबंध असहज भी हैं. भारत और नेपाल के बीच अबतक जो संधि और समझौते हुए हैं वो असमान संधि हैं जो नेपाल के हित का सही ढंग से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं.
दूसरी बात यह है कि कई संधियाँ बहुत पुरानी हो गई हैं और वर्तमान स्थिति से उनका जुड़ाव नहीं है. ऐसे में इन समझौतों में बदलाव लाने की ज़रूरत है और पुराने हो चुके समझौतों को खारिज करना चाहिए. उन्हें नए सिरे से विकसित किया जाना चाहिए.
भारतीय जेलों में आपने लंबा समय बिताया है. आप तो बाहर हैं पर भारतीय जेलों में अभी भी कई माओवादी विचारधारा के लोग क़ैद हैं. उनकी स्थिति के बारे में आप क्या सोचते हैं?
भारत सरकार को इस मुद्दे पर ध्यान देना पड़ेगा क्योंकि यहाँ आने के बाद कई नेताओं से हमारी बातचीत हुई और वो भी इसका शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं.
दरअसल, हम इसके लिए कोई दबाव तो नहीं डाल सकते हैं पर हमारे कॉमरेडों को बंद करके रखने के पीछे कोई जायज़ कारण नहीं है सरकार के पास. इसलिए हम चाहते हैं कि जल्द से जल्द उन्हें रिहा किया जाए.
भारत तो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है. यहाँ के माओवादी आंदोलन को आप किस तरह से देखते हैं?
देखिए, इस संदर्भ में गणतंत्र भी एक बहुत अस्पष्ट शब्द है. जहाँ राजतंत्र नहीं है वहाँ गणतंत्र है, ऐसा कहा जाता है. लेकिन किस गणतंत्र ने अपनी जनता को किस तरह से लाभ पहुँचाया है, यह एक महत्वपूर्ण सवाल है.
जहाँ तक भारत का सवाल है, यहाँ माओवादी आंदोलन के आलावा कई राष्ट्रीय आंदोलन भी चल रहे हैं. सरकार अलग-अलग स्तरों पर इनसे बातचीत भी कर रही है. अब भारत में संघर्ष का क्या रास्ता अपनाया जाना चाहिए, भारत में कैसी व्यवस्था लागू होनी चाहिए, सरकार के साथ विद्रोहियों को कैसे पेश आना चाहिए, इसका सारा निर्णय भारत के ही लोगों को लेना है क्योंकि यह उनके अधिकारों का मामला है.
क्या भारत के माओवादी आंदोलन को हथियार त्याग देने चाहिए या फिर नेपाल की स्थितियों की तरह व्यवस्था के बराबर ताकत जुटा पाने तक इंतज़ार करना चाहिए?
इसका फैसला यहीं के माओवादियों को करना होगा
तो क्या नेपाल का माओवादी आंदोलन भारत के माओवादियों का समर्थन नहीं करता है. उनका भारत के आंदोलन से कुछ लेना देना नहीं है...?
काम के स्तर पर या अभियान के स्तर पर भारत और नेपाल के माओवादियों के बीच कोई संबंध नहीं है. हाँ मगर विचारधारा के स्तर पर और राजनीतिक स्तर पर हम एक दूसरे के समर्थक है और यह कहने में हमें कोई हिचक भी नहीं है.
जहाँ तक माओवादी आंदोलन और सरकार के बीच की स्थिति का सवाल है, इसे भारत के ही लोगों को तय करना है. अगर हमसे मध्यस्थता करने के लिए कहा जाता है तो हम अपना सहयोग देने को तैयार हैं पर कुछ तय करना हमारा काम नहीं है.