शनिवार, 10 फ़रवरी, 2007 को 04:37 GMT तक के समाचार
आलोक प्रकाश पुतुल
बिलासपुर
अपने पति की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद बीमा राशी के लिए पिछले 17 सालों से अलग-अलग अदालतों के चक्कर काटने वाली कोरबा की नेमा बाई को उम्मीद है कि अब एकाध पखवाड़े में उन्हें न्याय मिल जाएगा.
नेमा बाई को यह उम्मीद बंधी है देश के पहले जन उपयोगी स्थायी लोक अदालत से, जहाँ पिछले मंगलवार से कामकाज शुरु हो गया.
छत्तीसगढ़ के रायपुर, बिलासपुर और जगदलपुर में शुरु हुए इन जनउपयोगी लोक अदालतों में पानी, बिजली, स्वास्थ्य, परिवहन, संचार, बीमा जैसे मुक़दमे सुलझाए जाएंगे.
उन अदालतों को बरसों से न्याय के इंतज़ार में पड़े लाखों मुक़दमों के बीच समय से न्याय मिल पाने की उम्मीद के रुप में पेश किया जा रहा है लेकिन इसे लेकर सवाल भी खड़े किए गए हैं क्योंकि इन अदालतों में उन्हीं मामलों का निपटारा हो सकता है जहाँ दोनों पक्ष समझौते के लिए राज़ी हों.
तीन सदस्यों वाले इस स्थाई लोक अदालत में कोई भी व्यक्ति सादे क़ागज़ पर अपनी समस्या लिख कर मामले को अदालत में प्रस्तुत कर सकता है.
इसके लिए उसे न तो सरकारी स्टांप पेपर की ज़रुरत होगी और ना ही किसी तरह का शुल्क जमा करना होगा. स्थायी लोक अदालत मामले के गुण-दोष के आधार पर संबंधित पक्ष को सुनवाई के लिए बुलाएगी और दोनों पक्षों की राय सुनकर फ़ैसला देगी.
अपील नहीं
अदालत में फ़ैसले के बाद किसी भी तरह की अपील का अपवाद के अलावा कोई प्रावधान नहीं रखा गया है.
इसके अलावा स्थाई लोक अदालत के फ़ैसले को किसी भी दूसरी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती.
अदालत को 10 लाख रुपए तक के मामलों में सुनवाई का अधिकार दिया गया है.
उम्मीद जताई जा रही है कि इस स्थाई लोक अदालत के कारण दूसरी अदालतों से मुक़दमों का बोझ कम होगा.
छत्तीसगढ़ के उच्च न्यायालय में ही लगभग 85 हज़ार मामले वर्षों से लंबित हैं. राज्य की निचली अदालतों में लंबित मुक़दमों की संख्या तो लाखों में है.
राज्य के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश एल सी भादू कहते हैं-“इस तरह की अदालतों में न्याय पाने के लिए जनता को खर्च नहीं करना पड़ेगा. सिर्फ एक आवेदन के बाद बिना खर्च के लोग अपनी समस्याओं को यहां आकर सुलझा सकेंगे. जो मामले हाईकोर्ट में नहीं चल रहे हैं, उन्हें आवेदन दे कर इन स्थाई लोक अदालतों में लाया जा सकेगा.”
जिस अपवाद की स्थिति में इस अदालत के फ़ैसले को चुनौती दी जा सकती है वह यह है कि अपीलकर्ता साबित करने की स्थिति में हो कि समझौते के लिए अदालत पहुँचे पक्षों में से एक फ़र्ज़ी था.
न्याय या निपटारा
अस्थाई तौर पर पहले भी राज्य में लोक अदालतें लगती रही हैं. लेकिन ये लोक अदालतें अभी भी लोकप्रिय नहीं हो पाई हैं.
ऐसे में क्या जन उपयोगी स्थाई लोक अदालत का भविष्य संदिग्ध नहीं है?
राज्य के वरिष्ठ अधिवक्ता और संविधान विशेषज्ञ कनक तिवारी कहते हैं- “सैद्धांतिक रुप से सुनने, कहने और घोषणा करने में इस तरह की अदालतें अच्छी लगती हैं लेकिन इसके क्रियान्वयन का स्वरुप बेहद घिनौना है. इस तरह की अदालतें मुक़दमे में न्याय नहीं करतीं, मुक़दमे का निपटारा करती हैं.”
कनक तिवारी का मानना है कि ऐसी अदालतों में कोई भी बड़े मामले नहीं आते. जो फ़रियादी होता है, वह इतना ग़रीब होता है कि उसके पास न तो न्याय पाने के लिए लगने वाला धन होता है और ना ही वक़्त, यहां तक कि अपने आवेदन में तर्क देने के लिए भी उसके पास कोई वकील तक नहीं होता.
वे कहते हैं कि उसका विरोधी कोई ताक़तवर होता है. ऐसे में इस तरह की अदालतें समझौता कराने की सरकारी प्रवृत्ति को ही बढ़ावा देती हैं.
हालांकि कई लोक अदालतें लगा चुके एक मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी कहते हैं, "इन अदालतों में सिर्फ़ वही मामले लिए जाते हैं जिनमें संबंधित पक्ष समझौते के लिए तैयार हों."
अपील न कर पाने को न्याय की स्वाभाविक प्रक्रिया के ख़िलाफ़ न होने की दलील देते हुए वे कहते हैं कि जब दोनों पक्षों ने अपनी मर्ज़ी से समझौता कर लिया तो फिर अपील की गुंजाइश ही कहाँ हैं.
मुक़दमों का बोझ
हालांकि राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव गौतम चौरड़िया इस बात से सहमत नहीं हैं. गौतम चौरड़िया बताते हैं कि पिछले 10 माह में ही राज्य में समय-समय पर लगने वाली अस्थाई लोक अदालतों में 19 हज़ार से अधिक मामले निपटाए गए हैं.
इसके अलावा इन मामलों में लगभग 27 करोड़ रुपए के अवार्ड भी पारित किए गए हैं.
चौरड़िया कहते हैं-“भारत जैसे देश में, जहां दस लाख लोगों पर औसतन 13 जज हैं और 2 करोड़ 95 लाख से अधिक मुक़दमें सुनवाई की प्रतीक्षा में हैं, इस तरह की स्थाई जन उपयोगी लोक अदालतें बेहद उपयोगी भी साबित होंगी और लोकप्रिय भी."
वे मानते हैं कि इससे देश की निचली अदालतों में लंबित ढाई करोड़ मुक़दमों का बोझ इस तरह की अदालतों से कुछ तो कम होगा ही.