रविवार, 11 फ़रवरी, 2007 को 20:48 GMT तक के समाचार
डॉक्टर प्रमोद कुमार
राजनीतिक विश्लेषक
पंजाब में राजनीति तय सीमाओं के तहत चलती है. मिश्रित धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं विभाजनकारी राजनीति को एक अलग रंग देती है.
जाति व्यवस्था तो यहाँ भी समाज में व्यापक तौर से फैली हुई है लेकिन चुनावी राजनीति में केवल इसी के बल पर वोट अपनी ओर नहीं खींचे जा सकते.
जाति व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर माने जाने वाले दलित भी किसी पार्टी के एकमुश्त वोट वैंक नहीं हैं.
इसकी वजह ये है कि पंजाब में दलित भले ही सामाजिक और आर्थिक रूप से उपेक्षा के शिकार रहे हों लेकिन दूसरे राज्यों में रहने वाले दलितों से काफ़ी बेहतर स्थिति में हैं.
वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार पंजाब में दलितों की जनसंख्या 29 फ़ीसदी है और राज्य में वर्ष 1967 से 2002 तक चुने गए 1014 विधायकों में दलितों की संख्या 25 प्रतिशत रही है.
पंजाब चुनाव में दलित फ़ैक्टर के विस्तृत विश्लेषण से चुनावी राजनीति में जाति विज्ञान के असर जैसे बड़े मुद्दे को समझने में मदद मिल सकती है.
दलितों को प्रतिनिधित्व
दलितों के 'अनिश्चित धार्मिक रुझान' और सामाजिक स्थिति तय करने वाले जाति व्यवस्था के अभाव में, दलितों को पंजाब की सभी पार्टियों में प्रतिनिधित्व मिला हुआ है.
यह रोचक तथ्य है कि जाटों की बहुलता वाले शिरोमणि अकाली दल में भी दलितों को ठीक-ठाक प्रतिनिधित्व मिला हुआ है.
वर्ष 2002 में चुने गए अनुसूचित जाति के विधायकों में सबसे अधिक (48 फ़ीसदी) कांग्रेस के थे. भारतीय जनता पार्टी ने भी दिलतों को टिकट दिए थे.
महत्वपूर्ण है कि ज़्यादातर दलित विधायक बहुजन समाज पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टियों की जगह अन्य पार्टियों से चुने जा रहे हैं.
दरअसल पंजाब में बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा दिलतों को अपना वोट बैंक नहीं बना पाई. उत्तर प्रदेश में तो बसपा को भारी सफलता मिली लेकिन पंजाब, जहाँ देश में प्रतिशत के हिसाब से सबसे अधिक दलित हैं - बसपा को इक्क-दुक्का सफलता ही मिली है.
उत्तर प्रदेश में बसपा को 1993 में 11 फ़ीसदी वोट मिले थे जो 2002 में बढ़कर 23 फ़ीसदी हो गया.
दरअसल शुरू में कम प्रतिनिधित्व मिलने की वजह से उत्तर प्रदेश और पंजाब, दोनों ही जगह दलित बसपा के साथ जुड़ाव महसूस करते थे लेकिन बाद में पंजाब में वे दलित पार्टी से दूर होते गए.
यही कारण है कि वर्ष 1992 के चुनाव में पंजाब में बसपा को 16 प्रतिशत वोट मिले जो वर्ष 2002 में घटकर महज छह फ़ीसदी रह गए.
वर्ष 1992 से 2002 तक के तीन विधानसभा चुनावों में बसपा को सिर्फ़ नौ सीटों पर सफलता मिली.
हालांकि बसपा ने वर्ष 1997 में 14 और वर्ष 2002 में 11 सीटों पर से कांग्रेस का गणित बिगाड़ दिया था.
सिख धर्म और आर्य समाज की भूमिका
रोचक तथ्य ये है कि बसपा के वोट में दो फ़ीसदी की वृद्धि से कांग्रेस को पाँच से 10 सीटों का नुक़सान हो सकता है.
आगामी विधानसभा चुनाव में अगर बसपा के वोट में दो फ़ीसद की वृद्धि हो जाती है और सत्ता-विरोधी रूझान भी असर दिखाता है तो कांग्रेस की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है.
सोचने वाली बात ये है कि बसपा राज्य में अपना असर क्यों नहीं छोड़ पाई?
दरअसल पंजाब अपनी धार्मिक सहिष्णुता के लिए जाना जाता है. सिख और आर्य समाज के लोगों ने दलित को जाति व्यवस्था आधारित कठोर सामाजिक आचरण से मुक्त कर दिया है.
इसके अलावा बसपा का राजनीतिक नारा भी पंजाब के क्षेत्रीय, सांस्कृतिक और आर्थिक मिजाज़ के अनुरूप नहीं है.
बसपा के दो महत्वपूर्ण नारे- जाति आधारित भेदभाव और मनुवाद को पंजाब में सिख धर्म और आर्य समाज की वजह से ज़मीन नहीं मिल पाई.
इसे वर्ष 1996 के संसदीय चुनाव में बसपा और अकाली दल के गठबंधन से दाओब क्षेत्र में जो परिणाम आए उसकी पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है.
दाओब में होशियारपुर, जालंधर और फिल्लौर संसदीय क्षेत्र आते हैं.
बसपा के मुखिया कांशीराम होशियारपुर से अकाली दल (बादल) के सक्रिय सहयोग की वजह से जीत पाए. आकलन के अनुसार डाले गए वोट में से 44 फ़ीसदी जाट सिख और अनुसूचित जाति के थे.
राज्य में दलितों के सामाजिक-आर्थिक सूचकांक के कुछ विचलित करने वाले पहलू भी हैं.
पंजाब में ग़रीबों की कुल जनसंख्या का आधा हिस्सा दलितों का है और दूसरी जातियों के मुक़ाबले यह बढ़ता ही जा रहा है.
दलितों के विकास के लिए चलाए जाने वाले कार्यक्रमों का बजट हर साल बढ़ाने के बावजूद इनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में कोई ख़ास सुधार नहीं हुआ है.
संसाधन, नौकरी, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा, समाज के कमजोर तबके तक पहुँचने चाहिए, नहीं तो दलित एक ख़ास वोट बैंक के रूप में उभर सकते हैं जिससे राज्य का राजनीतिक गणित गड़बड़ा सकता है.