रविवार, 11 फ़रवरी, 2007 को 21:24 GMT तक के समाचार
जगतार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार, चंडीगढ़ से
वर्ष 1967 के पंजाब विधानसभा चुनावों में शिरोमणि अकाली दल का चुनाव निशान 'हाथ का पंजा' था. लेकिन, आज वो 'हाथ का पंजा' अकालियों की चिरप्रतिद्वंद्वी काँग्रेस पार्टी का चुनाव निशान है. अकाली इसे अब 'ख़ूनी पंजा' कहते हैं यानि जो 'सिखों के ख़ून से रंगा' हुआ है.
पिछले सालों में अकाली दल ने अपने वोट बैंक में बढ़ोत्तरी करने की कोशिश में सिखों के मुद्दों से आगे बढ़कर पंजाबियों की बात करनी शुरू की है. मौज़ूदा चुनावों में तो वो 'पहचान की राजनीति' से परे आर्थिक मुद्दों की ही बात करते नज़र आ रहे हैं.
एक ज़माने में सिखों की प्रतिनिधि राजनीतिक पार्टी होने से लेकर आज तक शिरोमणि अकाली दल ने लंबा सफ़र तय किया है.
सिख अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों को अपना मुख्य चुनावी हथियार बनाने वाली शिरोमणि अकाली दल ने इस बार के अपने चुनावी घोषणापत्र में सिखों से जुड़े मुद्दों की कहीं चर्चा तक नहीं की है.
मुद्दा
इस बार शिरोमणि अकाली दल के नेताओं के भाषणों में सिखों से जुड़े मुद्दों या सिखों को भावनात्मक स्तर पर छूने वाले मुद्दों जैसे- राजधानी चंडीगढ़ पर दावा, पंजाबी बोलने वाले इलाक़ों का पंजाब में विलय और नदियों के पानी का वितरण जैसे मुद्दों का ज़िक्र तक नहीं है.
जबकि इन मुद्दों को पार्टी लंबे समय से चुनावों में उठाती रही है.
शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके बेटे और पार्टी के महासचिव सुखबीर सिंह बादल इन विधानसभा चुनावों में आर्थिक मुद्दों को ख़ास तौर पर उठा रहे हैं और प्रतिनिधि सरकार की बात कर रहे हैं.
उनका कहना है कि पंजाब को निरंकुश 'महाराजा' मुख्यमंत्री के शासन से मुक्ति दिलाई जाए.ग़ौरतलब है कि पंजाब के मौज़ूदा मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह पटियाला राजघराने के वंशज हैं.
अकाली दल भूमंडलीकरण के प्रभावों से भी मुक्त नहीं है.
पार्टी अपने दृष्टिकोण-पत्र में कहती है,"शिरोमणि अकाली दल का सपना है कि पंजाब को मानव संसाधन विकास में विश्व का नेता बनाया जाए, भ्रष्टाचार मुक्त, आमजन की भागेदारी वाले समतामूलक सुशासन के आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाए, सामाजिक ढाँचे को धर्मनिरपेक्ष बनाया जाए और आध्यात्मिक क्षेत्र को नैतिक और पारदर्शी बनाया जाए."
बदलाव
अकाली दल में बदलाव की प्रक्रिया सिख चरमपंथ के घटते प्रभाव के साथ शुरू हुई. चरमपंथ के दौर में हाशिए पर आने के बाद शिरोमणि अकाली दल ने सहभागी लोकतंत्र की बात करनी शुरू की.
फरवरी, 1996 में पंजाब के मोगा ज़िले में पार्टी के 75वें सम्मेलन में पार्टी की रणनीति में पहला बड़ा बदलाव देखने को मिला. इस सम्मेलन में सिख की जगह पंजाबियत की पहचान पर अधिक बल दिया गया.
इस बार पार्टी के घोषणा पत्र में सिख और पंजाबियत के बारे में अधिक न कहते हुए सिर्फ़ पार्टी का राजनैतिक दृष्टिकोण बताने वाले अंश में थोड़ा बहुत लिखा गया है.
इसमें लिखा है," शिरोमणि अकाली दल मानवता के कल्याण के लिए अपनी प्रतिबद्धता को दोहराता है. मौज़ूदा परिस्थितयों में पार्टी सिखों और पंजाबियों को राष्ट्रीय राजनीति में उनकी हिस्सेदारी दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है."
शिरोमणि अकाली दल सिर्फ़ अनपढ़ और गंवार किसानों की पार्टी नहीं है जिन्हें जत्थेदार कहा जाता था. आज नई पीढ़ी के नेता भी पार्टी के साथ हैं, जो विदेश में पढ़े हैं.
सुखबीर सिंह बादल ने अमरीका से प्रबंधन की पढ़ाई की है और उनके चचेरे भाई मनप्रीत सिंह ने लंदन में क़ानून की पढ़ाई की.
नई पीढ़ी के नेता सिर्फ़ सिख पहचान की राजनीति तक सीमित नहीं हैं. पंजाब के चरमपंथी आंदोलन में सिख पहचान की अवधारणा जुड़ी थी जो बीते दिनों की बात हो चुकी है.