मंगलवार, 30 जनवरी, 2007 को 17:32 GMT तक के समाचार
पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
तारीख़- 30 जनवरी, 2007
शर्मिला नाम की एक लड़की पिछले छह बरस से पूर्वोत्तर राज्यों में लागू विशेषाधिकार क़ानून का विरोध कर रही है. ख़ालिस गांधीवादी तरीके से, बिना कुछ खाए. इस समय दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती.
तारीख़- वही 30 जनवरी, 2007
उसी दिल्ली के विज्ञान भवन में सत्याग्रह की शताब्दी पर अंतरराष्ट्रीय सेमिनार हुआ जिसमें ज़ोरदार चर्चा हुई गांधीवाद, सत्याग्रह और अहिंसा के रास्ते पर.
यह तस्वीर एक उदाहरण भर ही है.
सत्याग्रह की शताब्दी के समारोह का हवाला देते हुए कांग्रेस पार्टी ने दुनियाभर के लोगों को राजधानी में इकट्ठा किया और गांधीवाद से लेकर सत्याग्रह के महत्व जैसे कई विषयों पर चर्चा की गई.
चर्चा नहीं हुई तो पूर्वोत्तर में पिछले छह बरस से अनशन पर बैठकर सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून का विरोध कर रही शर्मिला के अहिंसक विरोध की.
किसानों की आत्महत्या और विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन यानी 'सेज़' भी बहस या चर्चा में नहीं रहे.
इन ज़मीनी उदाहरणों से ऊपर उठकर सिद्धांतों के मसले पर होने वाले ऐसे बड़े बौद्धिक आयोजनों पर कुछ लोगों ने सवाल उठाए.
अपना-अपना नज़रिया
लोगों के इन सवालों के साथ हम पहुँचे गांधीवादियों, नेताओं और दुनिया के लगभग आधे देशों से दिल्ली पहुँचे प्रतिनिधियों के बीच, जो सत्याग्रह शताब्दी समारोह में गांधी के सिद्धांतों की बात कर रहे थे.
(आप इस विषय पर अपने विचार साथ दिए गए फ़ार्म में लिखकर भेज सकते हैं.)
इन लोगों से राय ली कि सत्याग्रह की राह पर चले रहे लोगों को क्या आज की सरकारें तरजीह दे रही हैं, क्या इसका कोई मतलब बचा है या फिर गांधी के रास्ते पर चलना अब प्रासंगिक नहीं रहा, क्या ऐसे समारोहों का आयोजन एक औपचारिकता भर ही है या फिर कुछ करने की इच्छाशक्ति भी शेष है....
गृहमंत्री शिवराज पाटिल शर्मिला के नाम पर थोड़ा अचकचाए. बोले, "मैं किसी व्यक्ति विशेष के बारे में नहीं कहूँगा क्योंकि इस मामले में चीज़ें न्यायालय से तय होनी हैं पर एक बात तो तय है कि दुनिया के 95 प्रतिशत लोग अहिंसा में विश्वास करते हैं. वो एक दूसरे को परस्पर सहयोग देने में विश्वास रखते हैं. अगर हम इसे अपनाकर चलें तो दुनिया और अच्छी लगेगी."
सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने इन सवालों पर कहा, "दुनिया की जो वर्तमान स्थिति है, आतंकवाद का जो सवाल है उसमें गांधी जी के विचार एक नए हथियार के रूप से दुनिया को रास्ता भी दिखा सकता है. इसी को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने यह आयोजन किया है."
उनका कहना था, "भारत के हर राज्य में कुछ लोग गांधी के रास्ते पर चलकर लड़ाई कर रहे हैं. भले ही इन लड़ाइयों में जल्दी सफलता न मिले पर लड़ाई का तरीका यही होना चाहिए. सरकार कभी झुकती है तो कभी नहीं भी झुकती है. उसके सामने क़ानून हैं, नियम हैं और अपनी सीमाएं हैं पर सभी लोगों को अहिंसक तरीकों से अपनी बात कहने वालों का सम्मान करना चाहिए."
आज के दौर में सत्याग्रह के रास्ते चलने वालों के सवाल पर रेलमंत्री लालू प्रसाद का कहना था, "जहाँ भी लोग सत्याग्रह का रास्ता अपनाते हैं, उनपर ध्यान दिया जाना चाहिए. इस मौक़े पर भी ऐसा सवाल उठाना काफ़ी अच्छी बात है."
पर आयोजन को सही ठहराते हुए लालू प्रसाद बोले, "गांधी जी ने जो आइडिया दिया था उसे दुनियाभर के लोगों को याद कराते रहने की ज़रूरत है. दुनिया हिंसा से प्रभावित है. सत्याग्रह के ज़रिए ही भटके हुए लोगों को मोड़ा जा सकता है."
वामपंथी नेता सीताराम येचुरी का मानना था कि अपनी बात को दर्ज कराने का एक तरीक़ा अहिंसा के रास्ते पर चलना भी है जिसे महात्मा गांधी ने इस्तेमाल किया.
येचुरी का कहना था, "हालांकि सत्याग्रह ही अपनी बातों को कहने का एकमात्र तरीका था, ऐसा न तो गांधी मानते थे और ऐसा मानना पूरी तरह से ठीक नहीं है. शर्मिला का सवाल इस आयोजन से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. इसका अपना महत्व है और आयोजन हो रहा है इसका यह मतलब नहीं कि हम वो सवाल भूल गए हैं. हम उम्मीद करते हैं कि सरकार उस सवाल को ध्यान रखेगी."
सीताराम येचुरी कहते हैं, "गांधी अगर आज ज़िंदा होते तो उन्हें आज की स्थितियाँ देखकर बहुत अफ़सोस होता. इसी सोच के साथ हमें आज प्रेरणा लेनी चाहिए कि हम अपने देश को एक बेहतर मुल्क बनाएँ."
गांधी के लोग
महात्मा गांधी की पोती इला गांधी का कहना था, "हम लोग जो भी कर सकते हैं, उससे बेहतर परिणाम आ सकते हैं. मुझे अच्छा नहीं लगता है कि मैं किसी की आलोचना करूँ. इस आयोजन में कई प्रभावशाली लोग हैं जिनके हाथ में ताक़त है और अगर वो यहाँ से जाकर अहिंसा के लिए कुछ करते हैं तो उससे काफी बल मिलेगा."
उनका मानना था, "जहाँ तक शर्मिला का सवाल है, इस बात को ध्यान रखने की ज़रूरत है कि गांधी ने कभी भी अकेले सत्याग्रह की बात नहीं की. उन्होंने इसके लिए समुदाय को साथ लेकर चलने की बात कही. दूसरा यह कि लोगों का समर्थन भी मिलना ज़रूरी है."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर इस सवाल पर बोले, "कभी-कभी यह सब देखकर लगता है कि ढोंग पर ज़्यादा पैसा ख़र्च होता है और समाज पर कम. सरकार चाहे कोई भी आए, इस तरह का शोर-शराबा, अंतरराष्ट्रीय स्तर के लोगों को बुलाना, यह सब होता रहता है. गांधी जी ख़ुद मौजूद होते तो इनकी परवाह नहीं करते."
ख़ुद लंबे समय से अहिंसक आंदोलनों का नेतृत्व कर रहीं समाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर का कहना था, "गांधी का सत्याग्रह तो पहले से भी ज़्यादा प्रासंगिक हो गया है और समाज इसे अपना भी रहा है पर जिन लोगों को इसे समझना चाहिए, इसे महत्व देना चाहिए, वो इसपर ध्यान नहीं दे रहे हैं."
मेधा का कहना था, "सत्ता के गलियारों में बहुत से लोग असंवेदनशील हैं. वे स्वार्थ और भ्रष्टाचार पर चल रहे हैं. वे सत्याग्रह की शताब्दी तो मना रहे हैं पर सत्याग्रह करने वालों की बातों का जवाब देने को तैयार नहीं हैं."
बहरहाल गांधी की प्रासंगिकता पर हो रहे इस आयोजन के बहाने उठा यह सवाल हमेशा प्रासंगिक रहेगा कि सरकारें और राजनीतिक दल सिर्फ़ रस्म निभा रहे हैं या वे गांधी के विचारों को लेकर गंभीर भी हैं.