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सोमवार, 29 जनवरी, 2007 को 04:21 GMT तक के समाचार

सत्याग्रह की शताब्दी का समारोह

महात्मा गाँधी के अहिंसक आंदोलन सत्याग्रह की सौवीं वर्षगांठ मनाने के लिए विश्व भर के जाने माने नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सैनानी सोमवार को दिल्ली में एकत्रित हुए हैं.

दो दिन के इस सम्मेलन में लगभग 83 देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं.

ये लोग गाँधी की विचारधारा और प्रासंगिकता पर अपने विचार रखेंगे.

विश्व के बड़े आंदोलनों में से एक सत्याग्रह की शताब्दी मनाने के लिए काँग्रेस ने यह सम्मेलन आयोजित किया है.

इसका विषय 'शांति, अहिंसा,सशक्तीकरण और 21वीं सदी में गाँधी का दर्शन' है.

इस सम्मेलन में नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त आर्कबिशप डेसमंड टूटू, मोहम्मद यूनुस, लेक वालेसा, दक्षिण अफ़्रीका के स्वतंत्रता सैनानी अहमद कथरादा, लार्ड भीकू पारिख और प्रोफेसर सीके प्रहलाद अपने विचार रखेंगे.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इस सम्मेलन में अपने विचार रखेंगे.

शुरुआत

महात्मा गाँधी ने 1906 में दक्षिण अफ़्रीका के जोहान्सबर्ग में सत्याग्रह की शुरुआत की थी.

वहाँ हज़ारों भारतीय इकट्ठा थे और अपने अधिकारों के लिए लड़ाई की शुरुआत कर रहे थे. मोहनदास करमचंद गाँधी ने इस आंदोलन को एक नया नाम दिया - सत्याग्रह.

दरअसल दक्षिण अफ़्रीका की सरकार ने एक क़ानून बनाकर कहा था कि भारतीयों को दक्षिण अफ़्रीका में रहने के लिए अपने आपको पंजीकृत करवाना होगा. इस पंजीकरण की शर्तें अजीब थी और इसके लिए शुल्क भी भारी भरकम था.

इसका विरोध करने के लिए भारतीय समुदाय के नेताओं ने यह बैठक बुलाई थी.

इसके बाद एक के बाद एक क़ानून आते रहे और भारतीय इसका विरोध करते रहे. कभी सालाना शुल्क लगाया गया तो कभी सरकार ने हिंदू विवाह पद्धति को ख़त्म किया.

इनका विरोध चलता रहा और 14 बरसों के आंदोलन के बाद आख़िरकार 30 जून, 1914 को सरकार और भारतीय समुदाय के बीच समझौता हुआ.

इन चौदह वर्षों में गाँधी को दो बार दो-दो महीनों के लिए और एक बार तीन महीने के लिए जेल जाना पड़ा था.

भारत आने पर उन्होंने अपने सत्याग्रह को 'अंग्रेज़ों भारत छोड़ो' का नाम दिया और 1947 को जो कुछ भारतीयों को हासिल हुआ उसमें इसका अहम योगदान है.