सोमवार, 29 जनवरी, 2007 को 21:23 GMT तक के समाचार
पीएम तिवारी
कोलकाता से
एशिया के सबसे बड़े कोलकाता पुस्तक मेले को कलकत्ता हाईकोर्ट ने पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन का हवाला देते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया है.
दुनिया भर में मशहूर यह पुस्तक मेला मंगलवार से शुरु होना था.
फ्रैंकफर्ट के बाद दुनिया में इस दूसरे सबसे बड़े पुस्तक मेले आयोजन 31 जनवरी से 11 फरवरी तक कोलकाता के बीचोबीच मैदान के इलाक़े में किया जाना था. लेकिन
लेकिन सोमवार को उद्घाटन से महज एक दिन पहले इसकी अनुमति देने से इनकार कर दिया.
इससे पहले राज्य सरकार ने सेना के नियंत्रण वाले मैदान में इस मेले के आयोजन की रक्षा मंत्रालय से अनुमति दिलाई थी.
अब आयोजक 'पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स गिल्ड' ने कहा है कि वह बुधवार को अदालती फैसले की प्रति मिलने के बाद ही अपनी बैठक में मेले के भविष्य का फैसला करेगा.
वकील और पर्यावरणविद् सब्यसाची चटर्जी की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत की एक खंडपीठ ने बीती 25 जनवरी को मेले की तैयारियाँ रोक देने का निर्देश दिया था.
अदालत ने कहा था कि मेले के आयोजन से पर्यावरण अधिनियम का उल्लंघन होगा.
मैदान इलाक़े को प्रदूषण मुक्त करने का अभियान चला रहे पर्यावरणविद् सुभाष दत्त ने इस फैसले को राजनीति पर पर्यावरण से जुड़े मुद्दों की जीत बताया है.
वे कहते हैं, "इस फ़ैसले से यह साफ़ हो गया है कि राजनेता हर मुद्दे का फैसला नहीं कर सकते."
पुराना विवाद
वैसे इस मैदान इलाके में पुस्तक मेले के आयोजन को लेकर पिछले दो वर्षों से विवाद चल रहा है.
पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे बड़े पैमाने पर प्रदूषण फैलता है और गंदगी की सफाई में महीनों लग जाते हैं.
विवाद बढ़ने पर राज्य सरकार व गिल्ड ने बीते साल हाईकोर्ट में दायर एक हलफनामे में कहा था कि मैदान इलाके में मेले के आयोजन का यह अंतिम मौका होगा. लेकिन इस साल भी मेले का समय क़रीब आते ही मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य पुराने स्थान पर ही मेला कराने के लिए सक्रिय हो गए.
अदालत ने अपने फैसले में इस मेले को अनुमति देने के लिए सेना, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, कोलकाता पुलिस व कोलकाता नगर निगम की खिंचाई करते हुए कहा है कि उन सबने जल्दबाज़ी में यह फैसला किया और इस दौरान पर्यावरण अधिनियम को ध्यान में नहीं रखा गया.
हाईकोर्ट ने आयोजकों पर भी ग़लतबयानी का आरोप लगाया.
अदालती फैसले के बाद गिल्ड के सचिव त्रिदिव चटर्जी से जब पूछा गया कि क्या मेले के लिए किसी वैकल्पिक स्थान की तलाश की गई है? तो उन्होंने कहा, "मैदान का कोई विकल्प ही नहीं है."
उनके बयान से 32वें पुस्तक मेले का आयोजन अनिश्चित ही लगता है.
बड़ा मेला
चटर्जी कहते हैं कि पुस्तक मेले व दूसरे मेलों में काफी अंतर है. यह महज मेला नहीं बल्कि इलाक़े की सबसे बड़ी सांस्कृतिक घटना है.
उल्लेखनीय है कि 31 वर्षों से पुस्तक मेला उसी जगह आयोजित होता रहा है.
लगभग साढ़े 12 लाख वर्गफ़ुट इलाके में होने वाले इस मेले में कोई साढ़े नौ सौ स्टाल लगते हैं. इसमें अमूमन 25 लाख लोग आते हैं. बीते साल मेले में 20 करोड़ की किताबें बिकी थीं.
मेले की परंपरा के तहत इस साल आस्ट्रेलिया इस मेले का थीम देश और अमेरिका अतिथि देश था.
मेले की तैयारियों पर लगभग साठ लाख रुपए खर्च हो गए थे. लेकिन अब अदालत ने आयोजकों से मेला स्थल को साफ़ कर उसे एक सप्ताह के भीतर उसके संरक्षक यानी सेना को सौंपने का निर्देश दिया है.
दूसरी ओर, कुछ बुद्धिजीवियों व साहित्यकारों ने मेले के मैदान में आयोजित नहीं होने को एक ‘सदमा’ क़रार दिया है.
जाने-माने साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय ने कहा है कि वे कुछ अन्य साहित्यकारों के साथ मिल कर 31 जनवरी को मेले की पुरानी जगह पर एक सांकेतिक पुस्तक मेला आयोजित करेंगे.
विश्लेषक इस अदालती फैसले को बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार के लिए झटका बता रहे हैं.