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गुरुवार, 25 जनवरी, 2007 को 15:08 GMT तक के समाचार

अनुराधा चिनॉय
रूसी मामलों की विशेषज्ञ

भारत-रूस में व्यापार की अपार संभावनाएँ

भारत और रूस की दोस्ती ऐतिहासिक रही है और उसमें समय-समय पर उतार-चढ़ाव भी देखने को मिला है लेकिन उसमें परंपरागत तौर पर गर्मजोशी रही है.

सोवियत रूस के ज़माने में दोनों देश के बीच व्यापार बहुत अधिक था. ये व्यापार रुपए और रूबल के बीच बँधा हुआ था.

जब सोवियत संघ टूटा तो इस आपसी व्यापार में कमी हुई. रूपए और रूबल में जो आपसी संबंध कायम हुए थे वो कमज़ोर हुए.

रूबल के दाम इतने कम हो गए कि दोनों देशों के लिए तय करना मुश्किल हो गया कि मुद्रा विनिमय का तरीका क्या होगा.

व्यापार का आपसी विश्वास टूटा और व्यापार में कमी हुई.

संभावना

आज भारत और रूस के बीच आपसी व्यापार क़रीब 12 हज़ार करोड़ रुपए का है. जिसमें भारत की हिस्सेदारी अभी बहुत कम है.

दोनों देश आपसी व्यापार बढ़ाने को इच्छुक हैं. उनकी राजनैतिक इच्छा और व्यापार संघों के प्रयासों को देखते हुए लगता है कि आने वाले आठ-दस सालों में यह व्यापार 90000 करोड़ रुपए हो जाएगा.

आज भारत बहुत तेज़ी से तरक्की कर रहा है लेकिन उसे हमेशा रूस की ज़रूरत पड़ती रहेगी. भारत की 70 फ़ीसदी रक्षा ज़रूरतों को आज रूस ही पूरा करता है.

रूस और भारत के बीच अन्य सामरिक मुद्दों जैसे ऊर्जा, परमाणु और वैज्ञानिक सहयोग को लेकर भी अच्छी समझ है.

सामरिक त्रिकोण

भारत, चीन और रूस के बीच पहले से सामरिक त्रिकोण की बात की जाती रही है. इसे सबसे पहले 1996 में तत्कालीन रूसी प्रधानमंत्री प्रिमाकोव ने उठाया था.

लेकिन भारत और चीन के आपसी मसलों की वज़ह से यह बात आगे नहीं बढ़ सकी. वैसे भारत और चीन में व्यापार काफ़ी बढ़ा है.

रूस चाहता है कि ये तीनों देश कई चीज़ों में इकट्ठा हिस्सा लें जैसे मध्य एशिया में, व्यापार में और ऊर्जा क्षेत्र में.

अंतरराष्ट्रीय महत्व के कई मुद्दों जैसे इराक़ उत्तर कोरिया और मध्य एशिया पर इन सबकी समझ एक हो सकती है.

लेकिन अभी तीनों देशों को साथ आने या किसी संधि या गठबंधन जैसी बात में समय लगेगा.

( बीबीसी संवाददाता सुशील झा से बातचीत के आधार पर)