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बुधवार, 24 जनवरी, 2007 को 17:35 GMT तक के समाचार

'नेपाल में दोषियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चले'

संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष मानवाधिकार अधिकारी लुई आर्बर ने माँग की है कि नेपाल में गृहयुद्ध के दौरान मानवाधिकारों का उल्लंघन करने के लिए सरकारी सुरक्षा बलों और माओवादी विद्रोहियों पर मुक़दमा चलाया जाना चाहिए.

लुई आर्बर ने छह दिन का नेपाल दौरा किया है और दौरे के बाद उन्होंने बीबीसी से कहा कि नेपाल में युद्धापराध हुए हैं.

नेपाल में लगभग एक दशक तक चले गृहयुद्ध में लगभग 13 हज़ार लोग मारे गए हैं और सैकड़ों अन्य लापता हुए हैं.

माओवादी विद्रोहियों और सरकार के साथ साल 2006 में शांति समझौता हुआ था और माओवादी विद्रोही इस समझौते के अनुसार बहुदलीय सरकार में शामिल होने के लिए भी सहमत हुए थे.

नेपाल के राजनीतिक दलों और माओवादियों का कहना है कि एक सत्य आयोग बनाएंगे.

राजधानी काठमांडू में बीबीसी संवाददाता चार्ल्स हैवीलैंड का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त लुई आर्बर यह संदेश देना चाहती हैं कि नेपाल में अतीत और वर्तमान में मानवाधिकारों का उल्लंघन बिना किसी डर के हुआ है. इसका यह मतलब भी निकाला जा सकता है कि नेपाल में क़ानून और व्यवस्था की स्थिति बहुत ख़राब है.

'नरसंहार'

लुई आर्बर ने बीबीसी के साथ एक इंटरव्यू में नेपाल के राजनीतिक नेताओं पर आरोप लगाया है कि 11 साल के संघर्ष के दौरान लोगों के साथ बहुत अपमानजनक व्यवहार किया है.

लुई आर्बर ने नेपाल में सत्य आयोग के गठन के फ़ैसले का स्वागत किया है लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि सत्य आयोग के काम करने से पहले अगर किसी भी पक्ष को आम क्षमादान दे दिया जाए तो वह बहुत ख़तरनाक साबित हो सकता है.

लुई आर्बर ने बीबीसी से कहा, "संयुक्त राष्ट्र बेहद गंभीर अपराधों के लिए आम क्षमादान देने के ख़िलाफ़ है जिनमें नरसंहार, युद्धापराध, मानवता के ख़िलाफ़ जैसे अपराध शामिल हैं, और नेपाल के मामले में युद्धापराध ज़्यादा लागू होते हैं."

लुई आर्बर ने एक संवाददाता सम्मेलन में यह स्पष्ट किया कि नेपाली सरकार और माओवादी विद्रोही दोनों ही पक्षों को अपराधों के लिए सज़ा मिलनी चाहिए.

उन्होंने नेपाल के दक्षिणी-पूर्वी क़स्बे लहान में हाल ही में हुई जातीय हिंसा पर भी चिंता जताई जिसमें पिछले शुक्रवार से पाँच लोग मारे गए. उनमें एक 16 साल का लड़का भी था.

नेपाल सरकार और माओवादियों के बीच अप्रैल 2006 में समझौता हुआ था और उसके बाद एक जाँच आयोग बिठाया गया था.

इस आयोग ने नरेश ज्ञानेंद्र और 200 अन्य लोगों को राजा विरोधी प्रदर्शनों में अत्यधिक बल प्रयोग के लिए ज़िम्मेदार ठहराया था. उन प्रदर्शनों के दौरान 20 लोगों की जान गई थी.