शुक्रवार, 19 जनवरी, 2007 को 12:59 GMT तक के समाचार
गीता पांडे
बीबीसी संवाददाता
इलाहाबाद के त्रिवेणी तट पर चल रहे अर्धकुंभ मेले में एक छोटे तंबू के बाहर कुर्सी पर बैठे 'पायलट बाबा' का निराले अंदाज़ में श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देना ख़ासा चर्चा में है.
जो भी तीर्थयात्री उनके दर्शन करता है वह उसके सिर पर हाथ रखते हैं और कहते हैं, "तुम पर ईश्वर की कृपा रहे".
इसके बाद बहुत से तीर्थयात्री 'बाबा' के पैरों के पास रखे कटोरे में सिक्के डाल देते हैं.
लोग अपनी तमाम परेशानियाँ बाबा को बताते हैं और बाबा अपने अंदाज़ में उन्हें भरोसा दिलाते हैं कि सब ठीक हो जाएगा.
एक महिला ने उनसे कहा, "बाबा मैं बहुत बीमार हूँ." बाबा ने उन्हें दिलासा देते हुए कहा, "तुम ठीक हो जाओगी."
दरअसल, उन्हें 'पायलट बाबा' कहे जाने के पीछे राज़ ये है कि 'सन्यास' लेने से पहले वो भारतीय वायुसेना में पायलट थे.
दर्शन
जब वो वायुसेना में थे तो उनका नाम कपिल सिंह हुआ करता था.
उन्होंने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी हिस्सा लिया और पाकिस्तानी इलाक़े में अपने लड़ाकू विमान से कई उड़ान भरीं.
बाबा बताते हैं, "इस दौरान बड़ी तादाद में लोग मारे गए. लेकिन जंग का क़ायदा ही ये है. अग़र आप नहीं मारेंगे तो खुद मारे जाएँगे."
उन्होंने बताया, "1996 में मैं भारत के पूर्वोत्तर में मिग विमान उड़ा रहा था. अचानक मैं विमान पर नियंत्रण खो बैठा. तभी मुझे कॉकपिट में अपने गुरु हरि बाबा के दर्शन हुए. उन्होंने विमान को सुरक्षित उतारने में मेरी मदद की. बस मैने नई जिंदगी जीने का फ़ैसला कर लिया."
बाबा कहते हैं कि नए जीवन से उन्हें शांति मिली है. वो कहते हैं, "अब मैं आराम से हूँ. कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं और मैं लोगों की मदद कर सकता हूँ."
आशीर्वाद
बाबा के इस दावे पर सवाल उठाए जा सकते हैं. लेकिन उनका आशीर्वाद पाने वालों की होड़ में भारत ही नहीं जापान, यूरोप और अमरीका के श्रद्धालू भी शामिल हैं.
एक युवा जापानी महिला कहती हैं, "मैं यहाँ आकर खुश हूँ." वो बाबा के कदमों में अपना सिर झुकाती हैं और बाबा कहते हैं, "भारत में आपका स्वागत है."
केसरिया चादर और चमकीली सुनहरी रंग की शॉल में लिपटे बाबा सिर पर टोपी लगाए होते हैं और यही टोपी उनके अतीत की थोड़ी बहुत याद दिलाती है. पायलट बाबा समाधि दिलाने के लिए मशहूर हैं.
उनका दावा है कि उन्होंने 100 बार समाधि की प्रक्रिया को अंजाम दिया है और इसमें से सबसे लंबी समाधि 33 दिनों की थी.
बाबा कहते हैं, "मैने नौ दिन तक जल समाधि ली है. इसके अलावा एक बार हवा रहित कमरे में भी रहा हूँ."
उनका कहना है, "समाधि चेतना के उच्च स्तर के पाने का तरीका है. आप शरीर और दिमाग से परे चले जाते हैं. आप सांस लेना रोक देते हैं और इस तरह आपकी भीतर की यात्रा शुरू हो जाती है. आप सच से रूबरू होते हैं और फिर आप समंदर बन जाते हैं."