शुक्रवार, 12 जनवरी, 2007 को 11:19 GMT तक के समाचार
नितिन श्रीवास्तव
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अपने एक अंतरिम आदेश की पुष्टि करते हुए पिछली एनडीए सरकार के कार्यकाल में आवंटित विवादास्पद पेट्रोल पंपों का लाइसेंस रद्द कर दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने कुल 297 पेट्रोल पंपों का आवंटन को रद्द किया है लेकिन जिन आवंटनों को बख्श दिया गया था वे अदालत के अगले आदेश तक चलते रहेंगे.
मामले की सुनवाई कर रही पीठ ने शुक्रवार को यह मामला रजिस्ट्रार के हवाले कर दिया ताकि आगामी 14 जनवरी को मौजूदा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वाईके सभरवाल के सेवानिवृत्त होने के बाद अगले मुख्य न्यायाधीश इसके लिए दूसरे बेंच का गठन करेंगे.
अगले मुख्य न्यायाधीश के तौर पर जस्टिस केजी बालाकृष्णन कार्यभार संभालने वाले हैं.
पृष्ठभूमि
केंद्र की पिछली एनडीए सरकार पर आरोप लगा था कि सरकार ने अपने गठबंधन से जुड़े लोगों के कई रिश्तेदारों को पेट्रोल पंप, एलपीजी और केरोसिन डिपो आवंटित किए थे.
इस विवाद के तूल पकड़ने के बाद सरकार ने खुद ही अपने ये आवंटन खारिज कर दिए थे.
इस मामले के वकील प्रशांत भूषण ने बीबीसी को बतया, "सरकार के इस फैसले के ख़िलाफ़ पेट्रोल पंप मालिकों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. इसी याचिका पर सुनवाई के बाद शुक्रवार के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पेट्रोल पंपों का लाइसेंस रद्द करने के फैसले को सही बताया है."
इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने चार वर्ष पहले एक दो सदस्यीय जाँच समिति का गठन किया था और अब इस समिति के सुझावों को मान लिया गया है. जस्टिस अग्रवाल की अध्यक्षता वाली इस समिति का गठन सुप्रीम कोर्ट ने ही 2002 में किया था.
रिपोर्ट
समिति ने वर्ष 2000 से 2002 के दौरान आवंटित 402 लाइसेंसों की जाँच की और पाया कि इनमें से 297 आवंटन नियमानुसार नहीं हुए हैं.
वर्ष 2002 में पता चला था कि बहुत सारे नेताओं को नियमों को ताक पर रख कर पेट्रोल पंप बांटे गए थे.
हालांकि इन आवंटनों में कांग्रेस से जुड़े लोगों के नाम भी शामिल थे लेकिन अधिकतर लोग ऐसे थे जिनके सहारे एनडीए की सरकार चल रही थी.