गुरुवार, 11 जनवरी, 2007 को 14:59 GMT तक के समाचार
संजीव श्रीवास्तव
बीबीसी के भारत संपादक
निठारी हत्याकांड शायद इक्कीसवीं शताब्दी के भारत का सबसे नृशंस, निर्मम, और बर्बर सच है. लेकिन क्या हम इस सच्चाई को स्वीकार कर रहे हैं? या फिर इस कांड से कोई सबक सीख रहे हैं?
क्या दोबारा ऐसा नहीं होगा, यह बात कोई भी नेता, पुलिस अधिकारी, या पत्रकार थोड़ी भी ईमानदारी से कह सकता है?
शायद नहीं. लेकिन क्यों?
इसलिए कि हम (और इस हम में मीडिया भी शामिल है) घटना के अर्थ को देखते हुए भी अनदेखा कर रहे हैं?
राजनेताओं के बीच चल रहे आरोप-प्रत्यारोप का द्वंद्व, निठारी कौन जा रहा है कौन नहीं, और फिर वहाँ जाकर क्या बयान दे रहा है, सीबीआई कब और किन बिंदुओं पर जाँच आरंभ करेगी, मामला अंग तस्करी का है या फिर शोषण का?
क्या अभियुक्त नरभक्षी भी हो सकते हैं? यूपी चुनाव पर इस कांड का क्या असर होगा? और नार्को विश्लेषण का क्या नतीजा है? यही सब बातें अब उद्वेलित या उत्तेजित कर रही हैं.
और यही अखबारों और खबरिया चैनलों की सुर्खियाँ भी हैं.
इन सब बातों में उलझना ही हमारे सोच के दिवालिएपन की शायद एक निशानी है.
क्या जिस देश में टेलीविजन पर क्राइम शोज लोकप्रियता का नया पैमाना हैं वहाँ हमारी सोच क्या इतनी विकृत हो चुकी है कि हम निठारी कांड को भी महज एक नृशंस और सनसनीखेज वारदात से ज्यादा की तरह से नहीं देख पा रहे.
व्यवस्था को इस सोच से ज्यादा कुछ माफ़िक नहीं आता. और इस व्यवस्था का सब हिस्सा हैं. राजनीतिक दल, प्रशासन, नेता, पुलिस, मीडिया... सभी.
जब तक देश का आम आदमी इस विवाद में उलझा रहेगा कि दोष अकेले नौकर सुरेन्द्र का है या फिर उसका मालिक भी इस अपराध में शामिल था, या फिर उसे टीवी चैनल और अखबार नार्को विश्लेषण और और 'ट्रुथ-सीरम' की पेचीदगियाँ समझाते रहेंगे उसका ध्यान इस केस के बुनियादी सच से हटा रहेगा.
और इसी में व्यवस्था अपना हित देखती है.
सच यह है कि अगर किसी को भी यह खुशफ़हमी थी कि भारतीय लोकतंत्र में हर व्यक्ति को समान अधिकार है.
कानून व्यवस्था, पुलिस प्रशासन, और सरकारी तंत्र आम भारतीय की सेवा और सुरक्षा के लिए है तो कम से कम निठारी कांड के बाद तो इस सोच की गुंजाईश कोई बहुत बड़े दिल वाले व्यक्ति या फिर किसी सिरफिरे के मन में ही हो सकती है.
निठारी एक ऐसा मामला है जिसमें भारतीय सरकारी तंत्र और व्यवस्था के हर दावे को झुठला दिया है. और यह लगभग साबित कर दिया है कि भारत के कमजोर, गरीब और असहाय आम आदमी के लिए इस व्यवस्था में कोई जगह, पूछ या सुनवाई नहीं है.
बात सिर्फ पुलिस लापरवाही और उसमें संवेदनशीलता की कमी की भी नहीं है. यह पूरा मामला शायद हाल के वर्षों में इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि इस पूरी व्यवस्था में ग़रीब का कोई माई-बाप नहीं है.
और इस बात का भी कि किस तरह भारतीय सरकारी तंत्र ग़रीब के प्रति स्वयं को किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं मानता.
क्या किसी भी अन्य देश में, जो क़द-काठी में भारत जैसा ही हो, निठारी हो सकता था?
डेढ़ वर्षों तक एक ही इलाक़े से एक के बाद एक दर्जनों बच्चे गायब हो जाएँ और पुलिस केस तक दर्ज नहीं करे. केस दर्ज कराने के लिए लोगों को प्रदर्शन और अदालत का सहारा लेना पड़े.
दूसरे देशों से तुलना छोड़िये. क्या निठारी के बच्चों में से एक भी यदि तथाकथित अभिजात्य वर्ग का होता तो भी क्या पुलिस वही करती जो उसने किया.
हम 8 से 9 प्रतिशत की दर से आर्थिक विकास की बात करते हैं. सुरक्षा परिषद में स्थान चाहते हैं. आर्थिक और सामरिक महाशक्ति बनना चाहते हैं.
पिछले वर्ष चीन से ज्यादा करोड़पति भारत में बने. 2010 तक भारतीय चाँद पर होगा और 2030 तक भारतीय अर्थव्यवस्था अमेरिक और चीन के बाद विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगी.
ये सभी दावे सच हो सकते हैं. और जब ऐसा होगा तो हमें स्वाभाविक तौर पर गर्व भी होगा. होना भी चाहिए. लेकिन क्या हममें से कोई भी उतने ही आत्मविश्वास के साथ यह कह सकता है कि 2030 में निठारी की पुनरावृत्ति नहीं होगी?
उत्तर हम सबको मालूम है.