गुरुवार, 11 जनवरी, 2007 को 06:34 GMT तक के समाचार
भारतीय संसद और सर्वोच्च न्यायालय के बीच कई मुद्दों पर लगातार चल रही खींचतान में अब एक नया मोड़ आया है.
भारत के मुख्य न्यायाधीश वाईके सभरवाल की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय पीठ ने फ़ैसला सुनाया है कि संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों के विपरीत जाने वाले क़ानूनों की समीक्षा का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को है भले ही वह क़ानून नौवीं अनुसूची का हिस्सा क्यों न हो.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि 24 अप्रैल 1973 के बाद नौंवी अनुसूची में डाले गए सभी क़ानूनों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है.
1951 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संविधान में संशोधन करके नौंवी अनुसूची का प्रावधान किया था ताकि भूमि सुधारों को अदालत में चुनौती न दी जा सके.
नौवीं अनुसूची में रखे गए क़ानूनों के सुप्रीम कोर्ट की परिधि से बाहर होने का राजनीतिक लाभ अलग-अलग दौर में उठाया जाता रहा है और इस समय नौवीं अनुसूची में 284 क़ानून हैं जिनकी न्यायिक समीक्षा इस फ़ैसले से पहले संभव नहीं थी.
कई क़ानून
इस फ़ैसले से स्पष्ट हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट नौंवी अनुसूची के राजनीतिक इस्तेमाल को रोकना चाहती है यानी संसद और सुप्रीम कोर्ट के बीच इस बात की तकरार फिर छिड़ेगी की विधायिका और न्यायपालिका में अधिक अधिकार किसके पास हों.
पिछले कुछ वर्षों में संसद और विधानसभाओं में अनेक ऐसे क़ानून बनाए गए हैं जो संविधान के प्रावधानों या सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के विपरीत जाते हैं.
मिसाल के तौर पर, संविधान के तहत अधिकतम 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है लेकिन तमिलनाडु में एक क़ानून बनाकर सरकारी नौकरियों में 61 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है, तमिलनाडु सरकार के इस क़दम को अब तक अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती थी क्योंकि उसे नौंवी अनुसूची में डाला गया है.
अब इस आदेश के बाद तय है कि सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं की भरमार हो सकती है और सरकार को अदालती चुनौतियों से बचने का दूसरा रास्ता ढूँढना निकालना होगा.