बुधवार, 10 जनवरी, 2007 को 09:44 GMT तक के समाचार
अमरनाथ तिवारी
लखानऊ गाँव, बिहार से
सुविधाओं के अभाव वाले इस गाँव में घर की छतें फूस की हैं और सड़कें अभी भी कच्ची हैं. लेकिन यह गाँव एक ख़ास मायने में दूसरे गाँवों से अलग है.
बिहार के इस गुमनाम से गाँव लखानऊ को भारत में सद्दाम हुसैन का गाँव कहा जा सकता है.
इस गाँव के बहुत सारे लोगों ने अपने बच्चों का नाम सद्दाम हुसैन रखा है.
अकेले इस गाँव में 20 से अधिक बच्चों का नाम सद्दाम हुसैन है.
हालांकि स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि इसमें आस-पास के 27 सुन्नी बहुल गाँवों को मिला दिया जाए तो सद्दाम हुसैन नाम वाले बच्चों की संख्या 100 पार कर जाएगी.
कई लोगों ने तो बाद में बच्चों का नाम बदला है.
सद्दाम को सम्मान
लखानऊ गाँव के एजाज आलम ने अपने तीन वर्षीय बेटे मज़हर आलम का नाम बदल कर सद्दाम हुसैन रख दिया है.
ऐसा उन्होंने भूतपूर्व इराकी नेता सद्दाम हुसैन के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए किया है जिन्हें 30 दिसंबर को फाँसी दे दी गयी थी.
एजाज आलम कहते हैं, "ख़ुदा ने चाहा तो एक दिन हमारा गाँव सद्दाम हुसैनों से भर जाएगा."
इस गाँव में एक परिवार तो ऐसा भी है जिसमें एक बेटे का नाम सद्दाम हुसैन और दूसरे बच्चे का नाम ओसामा बिन लादेन रखा गया है.
शायद यह महज कोई संयोग नहीं है कि सद्दाम हुसैन नाम वाले सारे बच्चे 1991 के पहले अमरीका-इराक युद्ध के बाद ही पैदा हुए हैं.
मोहम्मद निज़ामुद्दीन के पोते का जन्म 1991 में हुआ था और उनका नाम भी सद्दाम हुसैन है.
निज़ामुद्दीन कहते हैं, "इस लड़ाई से पहले बिरले ही किसी बच्चे का नाम सद्दाम हुसैन रखा जाता था."
हाल में इराकी नेता की फाँसी के बहुप्रसारित तस्वीरों के बाद लखानऊ गाँव के निवासियों ने फैसला किया है कि सभी नवजात बच्चों का नाम सद्दाम हुसैन ही रखा जाएगा.
स्थानीय नेता अयूब खान कहते हैं, "जॉर्ज बुश एक सद्दाम हुसैन को फाँसी पर लटका सकते हैं लेकिन हम सद्दाम हुसैनों की फ़ौज तैयार कर देंगे."
इस गाँव में सद्दाम हुसैन के ख़राब मानवाधिकार रिकॉर्ड या उनके द्वारा की गई कथित हत्याओं के बारे में कोई चर्चा नहीं होती. उनके व्यक्तित्व के आवरण में सब कुछ ढँक गया सा लगता है.
गाँव से सटे 'दीनी एकेडमी' नाम के एकमात्र निजी पाठशाला में 100 के लगभग सद्दाम हुसैन पढ़ने, लिखने और भूतपूर्व इराकी नेता के बारे में अधिक जानने के लिए आते हैं.
सद्दाम अमर
ज़्यादातर गाँव वाले मानते हैं कि फाँसी दिए जाने के बाद सद्दाम हुसैन अमर हो गए हैं.
इनमें से कई सद्दाम हुसैन के बारे भले ही कुछ नहीं जानते हों लेकिन उनका उस दुष्प्रचार में पूरा विश्वास है जिनमें सद्दाम हुसैन को लगभग ईश्वर की तरह का दर्जा दिया जाता है.
सद्दाम हुसैन नाम के बच्चों को शुरु से ही उसी तरह की सोच रखने का पाठ पढ़ाया जाता है.
मई 1993 में पैदा हुए एक छोटे से सद्दाम हुसैन कहते हैं, "सद्दाम हुसैन नाम रखे जाने पर मैं गौरवान्वित महसूस करता हूँ. वह एक महान नेता थे. एक शेर थे जिन्होंने अमरीका से लोहा लिया और गरीबों के मसीहा बने."
वे कहते हैं, "मैं इराक़ी राष्ट्रपति के तरह ही बनना चाहूँगा और उन्हीं के तरह की मौत भी चाहूँगा."
खाड़ी युद्ध के तुरत बाद पैदा हुए और शायद गाँव के सबसे बड़े सद्दाम हुसैन कहते हैं, " मैं अपने पिता का ऋणी हूँ जिन्होंने मेरा नाम इस पूज्य नेता के नाम पर रखा. मुझे तो अख़बार में उनकी फाँसी की ख़बर और तस्वीरें देखकर ही पता चला कि वे कितने महान थे."
सद्दाम हुसैन को फाँसी के दिन सभी के सभी सद्दाम हुसैन गाँव के मस्जिद में इकट्ठा हुए और इराकी नेता के आत्मा को शांति के लिए प्रार्थना की.
इसके बाद उन्होंने एक जुलूस निकाला और जॉर्ज बुश के पुतले जलाए.
लेकिन इतने सारे सद्दाम हुसैन के होने से एक समस्या भी होती है.
गाँव के ही मोहम्मद अब्बास कहते हैं, "खेल के मैदान में जिस सद्दाम हुसैन के पीछे दूसरा सद्दाम हुसैन भाग रहा होता है, वह सद्दाम हुसैन ख़ुद किसी दूसरे सद्दाम के पीछे होता है लेकिन किसी और सद्दाम हुसैन की पहुँच से काफ़ी दूर होता है."