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मंगलवार, 09 जनवरी, 2007 को 12:07 GMT तक के समाचार

श्याम सुंदर
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

निठारी मामले की जाँच में कई खामियाँ

निठारी हत्याकांड की तह तक पहुँचने में शायद अभी काफ़ी समय लगे. पर इस मामले से जुड़ी कुछ बातें, ख़ासकर पुलिस की ढिलाई और आपराधिक लापरवाही, ऐसे तथ्य हैं, जिसे बिना सीबीआई जाँच के ही पूरा देश जैसे मान चुका है.

पर इस मामले से जुड़े कुछ तथ्य ऐसे हैं जिन पर पुलिस, प्रशासन और स्थानीय नेता पर्दा डाल रहे हैं.

मीडिया और जनता को दिखाने के लिए सरकार ने कार्रवाई का ढोंग रचा.

कुछ पुलिस अधिकारी निलंबित किए गए. लेकिन बीबीसी को मिली जानकारी के अनुसार इस कार्रवाई के बाद तो यही लगता है कि पूरे कुएँ भाँग पड़ी है.

पक्षपात

जिस पुलिस सब इंस्पेक्टर को निठारी मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए शाबाशी या पदक मिलना चाहिए था उसे बर्ख़ास्त कर दिया गया और जिस वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के कार्यकाल में सच को सबसे ज़्यादा नकारा गया उनके नेतृत्व में ही जाँच अब तक चल रही है.

बर्ख़ास्त सब इंस्पेक्टर हैं विनोद पांडे और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी है एसएसपी आरके सिंह राठौर.

आरके सिंह राठौर के कार्यकाल में पाँच महीने तक पायल के पिता की शिकायत नहीं सुनी गई.

पायल के मोबाइल फ़ोन के ज़रिए ही अंततः पुलिस कथित अभियुक्तों तक पहुँची. इन पाँच महीनों में कई बच्चे और मारे गए.

राठौर भी इसे जाँच का विषय मानते हैं.

बकौल राठौर, ‘‘ये जाँच का विषय है. जाँच चल रही है और जो दोषी पाए जाएँगे उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी.’’

इतना ही नहीं, राठौर के ही कार्यकाल में पिछले माह तीन दिसंबर को मोनिंदर सिंह को हिरासत में लिया गया पर पूछताछ कर छोड़ दिया गया.

और जब नौकर सुरेंद्र ने कथित तौर पर बच्चों को मारने की बात स्वीकारी तब भी एसएसपी राठौर मोनिंदर को दोषी बताने या फिर मानव अंगों की तस्करी की आशंका को टालते रहे.

जवाबदेही

कुल मिलाकर उनकी कोशिश रही कि पूरे मामले को उनसे पहले के अफसर पर डाल दिया जाए.

राठौर ने कहा, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. सुरेंद्र घरेलू नौकर था मोनिंदर का इससे कोई ताल्लुक नहीं है और न ही सुरेंद्र ने ऐसी बात बताई है.’’

और शायद वो इसमें क़ामयाब भी रहे. उनसे पहले के एसएसपी पीयूष मोर्डिया को निलंबित कर दिया गया.

लेकिन सरकारी कार्रवाई का जो सबसे अफसोसजनक पहलू रहा वो ये कि उसी सब इंस्पेक्टर को बर्खास्त कर दिया गया जिसने 21 दिसंबर तो पता लगाया कि पायल का मोबाइल अभी भी इस्तेमाल हो रहा था.

उसी मोबाइल के ज़रिए पुलिस ने सुरेंद्र और मोनिंदर को गिरफ्तार किया. बीबीसी के पास वो दस्तावेज़ मौजूद हैं जिनसे ये साबित होता है कि सब इंस्पेक्टर विनोद पांडे की भूमिका इस मामले को सुलझाने में सबसे अहम थी.