शनिवार, 06 जनवरी, 2007 को 03:34 GMT तक के समाचार
नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता,जयपुर
प्रवासी पक्षियों के लिए दुनिया भर में मशहूर भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान से इस बार परिंदों ने किनारा कर लिया है.
इस शीतकालीन विहार स्थली में पक्षियों ने इस बार घोंसले भी नहीं बनाए हैं. दुर्लभ प्रजाति की साइबेरियन सारस पहले ही इस आश्रयस्थली को अलविदा कह चुकी है.
पूर्वी राजस्थान में स्थित यह राष्ट्रीय उद्यान सर्दियों में देसी-विदेशी परिंदों के अनुपम क्रीड़ांगन में बदल जाता था लेकिन इस बार वहाँ एक सौ से भी कम पक्षी बसेरा करने आए हैं.
उद्यान के अधिकारियों के मुताबिक गत वर्ष यहाँ बसेरा करने वाले पक्षियों की संख्या दस हज़ार थी. अब वहाँ गिने-चुने परिंदे रह गए हैं. उद्यान में पानी की कमी के कारण पक्षियों ने पलायन कर लिया.
पक्षियों को दाना पानी उपलब्ध कराने वाली ताज़ा पानी की झील भी पानी को तरस रही है.
निराशा
सर्दियों में इन रंग बिरंगे पक्षियों का उन्मुक्त विहार देखने पहुँच रहे पर्यटक निराश लौट रहे हैं. पिछले साल एक लाख दस हज़ार सैलानी भरतपुर पहुँचे थे, जिनमें 34 हज़ार विदेशी थे.
पर्यटक अब भी भरतपुर आ रहे हैं. लेकिन वे लगे हाथ वापस भी लौट रहे हैं. अपने परिजनों के साथ दिल्ली से आए रमानाथ खंडेलवाल कहते हैं,‘‘हम यहाँ हालत देखकर बहुत मायूस हुए हैं. जब पानी ही नहीं है तो पक्षी यहाँ क्यों रुकेंगे.’’
मुज़फ्फ़रनगर से आए सुधीर पवार कहते हैं,‘‘उद्यान की हालत देखकर रोना आता है. सरकार को इन पक्षियों पर रहम करना चाहिए.’’
राष्ट्रीय उद्यान के एक अधिकारी कालीचरण वर्मा ने स्वीकार किया कि पानी की समस्या बहुत गंभीर है. प्रशासन ने छह गहरे कुएँ खुदवाकर पानी की वैकल्पिक व्यवस्था की है.
दीर्घकालीन योजना पर भी काम चल रहा है. वन अधिकारियों ने बताया कि परिंदों ने पानी की कमी देखकर यहाँ अपना प्रवास समाप्त कर दिया. बीते साल इन पक्षियों ने दो हज़ार घोंसले बनाए थे. लेकिन इस बार घोंसले की कमी है.
सरकार ने समीप के पाँचना बांध का पानी उद्यान तक प्रवाहित कर लाने की योजना बनाई थी लेकिन स्थानीय लोगों ने उग्र आंदोलन कर इसे रोक दिया.
भरतपुर के पर्यावरण कार्यकर्ता डॉ एमएम त्रिगुणायन कहते हैं कि पाइप लाइन से पानी लाना ठीक नहीं होगा क्योंकि वर्षाजनित पानी प्रवाहित होकर आता है तो परिंदों के लिए भोजन भी लाता है.
कुछ पक्षियों का यहाँ स्थाई बसेरा है. लेकिन 390 प्रजाति के पक्षी हज़ारों किलोमीटर लंबी उड़ान भर कर यहाँ पहुँचते हैं. इनमें साइबेरिया, मध्य एशिया, तिब्बत, अफ़ग़ानिस्तान और भूटान जैसे मुल्कों के पक्षी शामिल हैं.
कभी यह उद्यान रंग-बिरंगे पक्षियों के कलरव से गूंजायमान रहता था. अब वहाँ खामोशी है क्योंकि राजनीति की टेबल पर जब पानी की हिस्सेदारी और ज़रूरत का हिसाब हुआ तो परिंदो की प्राथमिकता को भूला दिया गया.