रविवार, 31 दिसंबर, 2006 को 06:27 GMT तक के समाचार
भारत के सभी अख़बारों में पूर्व इराक़ी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की दी गई फाँसी की सज़ा प्रमुखता से छपी है. कई अख़बारों में तो पूरा पहला पन्ना ही इस समाचार के विभिन्न पहलुओं को समर्पित है.
नवभारत टाइम्स की बैनर हेडलाइन है - 'बे-सद्दाम इराक़ अब नए मोड़ पर.' अखबार का कहना है कि बकरीद और नए साल से एक दिन पहले अमरीकी बंदूकों के साए में सद्दाम फाँसी दे दी गई. इसी समाचार के साथ छपी एक ख़बर की सुर्खी है - 'हाथ में क़ुरान और चेहरा बैख़ौफ़ था.'
दैनिक जागरण का संक्षिप्त शीर्षक है - 'सद्दाम को फाँसी.' इस विषय पर अपने संपादकीय में अख़बार लिखता है कि सद्दाम हुसैन को फाँसी होने पर प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है लेकिन पूर्व तानाशाह के प्रति सहानुभूति के स्वर सामने आना विचित्र है.
अंग्रेज़ी के अख़बार द हिंदू ने अपने संपादकीय में सद्दाम हुसैन को फाँसी दिए जाने को 'उपद्रवी' कार्रवाई बताया है. अख़बार का कहना है कि अपने प्रतिद्वंद्वियों के ख़िलाफ़ क्रूर्तापूर्ण कार्रवाई से सद्दाम ने अपनी जनता को दुख पहुँचाया लेकिन ये कहना कि सद्दान को फाँसी देना न्यायसंगत है कोरा झूठ होगा. अख़बार का ये भी कहना है कि भारत को इस मामले में इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ स्पष्ट रवैया अपनाना चाहिए.
अमर उजाला ने सुर्खी लगाई है - 'सद्दाम ने बेनकाब मौत चुनी.' अख़बार का कहना है कि इराक़ में फाँसी के ख़िलाफ़ आक्रोष है.
हिंदुस्तान की सुर्खी है - 'सद्दाम ने चूमा फंदा, बुश ख़ुश.' इसी के साथ अख़बार बताता है कि इराक़ में धमाके हुए हैं और 75 लोग मारे गए हैं.
अंग्रेज़ी के अख़बार संडे टाइम्स ने पहले पन्ने के अलावा एक पूरा पृष्ठ सद्दाम और इराक़ पर छापा है. इस पन्ने में एक समाचार है भारत के परमाणु बम के जनक माने जाने वाले राजा रमन्ना के बारे में. इस समाचार में बताया गया है कि सद्दाम हुसैन ने राजा रमन्ना के सामने पेशकश की थी कि वे इराक़ में रहें और इराक़ का परमाणु बम बनाएँ.