गुरुवार, 28 दिसंबर, 2006 को 17:17 GMT तक के समाचार
फ़ैसल मोहम्मद अली
बीबीसी संवाददाता, इंदौर से
मध्यप्रदेश के पश्चिमी शहर इंदौर और आस-पास के इलाकों में आजकल कम उम्र के युवक-युवतियाँ नाच-गाने में रिकॉर्ड बनाने और शोहरत कमाने में लगे हैं.
अनुष्का सिंघल के 18 घंटे लगातार गाने के कीर्तिमान के बाद आकांक्षा जायक ने 61 घंटे और फिर पास के शहर खंडवा की सानिया सैयद ने 65 घंटे गाने का रिकॉर्ड बना डाला.
इसके बाद दीप गुप्ता ने तो दक्षिण के शहर कोयम्बटूर जाकर 101 घंटे तक अलाप करने का करिश्मा कर दिखाया.
सानिया सैयद रिकॉर्ड हाथ से जाने नहीं देना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने दोबारा अपनी सुर लहरी 130 घंटे तक लगातार बिखेरी.
गाने वालों के बाद मैदान में उतरे हैं नाचने वाले. अपने ‘गॉड गिफ्टेड टैलेंट’ के माध्यम से सबकी नज़रों में पहचान बनाने की आकांक्षा रखने वाली अदिति गुप्ता लगातार 85 घंटे तक नाचती रहीं.
अदिति की माँ अनीता गुप्ता कहती हैं कि अदिति हमेशा से कोई बड़ा काम करना चाहती थी और आकांक्षा के रिकॉर्ड बनाने के बाद उसने तय किया कि वह भी डांस में कीर्तिमान स्थापित करेगी.
क्षणिक लोकप्रियता
बुद्धिजीवी राजीव शर्मा इस शोहरत को क्षणिक और मीडिया अटेंशन की उपज मानते हैं. वे रिकॉर्ड बनाए जाने की इस पूरी स्पर्धा की गुणवत्ता और सामाजिक-आर्थिक उपयोगिता पर ही प्रश्न उठाते हैं.
वो कहते हैं, “ये कैसे रिकॉर्ड्स हैं जहाँ लगातार गाने से आवाज इतनी बेसुरी हो जाए कि सुननेवाले को बोरियत महसूस हो. जिस डांस को कत्थक बताया जाए वह नाच ही न लगे और जिस किताब यानी गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज कराने की आपाधापी मची है, वह किताब क्या है ? किसी ने मूँछें दो मीटर लंबी कर लीं तो कोई बालों से गाड़ी खींचता है.”
नए-नए मशहूर हुए प्रतिभावान लोग इन बातों को भुलाकर ‘स्टार स्टेटस’ का मज़ा ले रहे हैं.
अब तो शहर के बड़े-बड़े चिकित्सक उनके साथ खड़े होकर तस्वीर खिंचवाने को लालायित हैं.
इन कार्यक्रमों के आयोजक यानी इन कलाकारों को स्टेज और पब्लिसिटी वगैरह मुहैया कराने वाली संस्थाएँ इंदौर का नाम रोशन होने पर गर्व महसूस कर रही हैं.
फ़्यूजन नाम की संस्था के देव जोशी कहते हैं कि अदिति गुप्ता आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिभा हो गई हैं जिससे शहर को भी ख़्याति मिली है.
वे कहते हैं, "लता मंगेशकर, राहत इंदौरी, सलीम ख़ान इसी माटी के हैं. गायक किशोर कुमार के भी खंडवा से होने की बात याद दिलाई जाती है."
समाजशास्त्री नीलम हिंगोरानी हाल के रिकॉर्ड स्थापित करने की होड़ को छोटे शहरों में भी पेज-थ्री कल्चर के आगमन का प्रतीक मानती हैं यानि उस संस्कृति का हिस्सा जिसमें कुछ लोगों को यूँ ही मशहूर कर दिया जाता है.
ऐसे आयोजनों में सालों से लगे सुनील जैन के मुताबिक इस तरह की प्रतिस्पर्धा कुछ संस्थाओं द्वारा प्रोमोट की जा रही है जो इनके नाम पर और स्टेज और बैनर बनवाकर पैसे उगाहते हैं.
कुछ पैसे प्रोग्राम पर खर्च कर देते हैं और थोड़ा-बहुत इन कथित प्रतिभाओं को भी देते हैं.
दुष्प्रभाव
मनोचिकित्सक वीरेंद्र सिंह पाल ऐसी गुणवत्ता रहित रिकॉर्ड बनाने की प्रतिस्पर्धा को ठीक नहीं मानते.
वह कहते हैं, “ऐसे आयोजन सस्ती लोकप्रियता पाने का आसान तरीका है जिसे अपने व्यक्तित्व की पहचान ढूँढ़ रहा कम उम्र का बच्चा अक़्सर समझ नहीं पाता और इसमें उनके माता-पिता का भी हाथ होता है. जो स्वयं नहीं कर पाए वह अपने बच्चों के माध्यम से कर लें.”
वीरेंद्र सिंह पाल मानते हैं कि इससे बच्चों में कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक विकार पैदा हो सकते हैं.
इस इलाके में रिकॉर्ड बनाने के मैदान में उतरे अधिकांश प्रतिभावानों के पास भविष्य की कोई योजना नहीं है.
न गायकों के पास रियाज़ के लिए कोई उस्ताद है न ही नृतक-नृतकियों को नृत्य-साधना के लिए गुरु की ज़रूरत.
मगर इससे क्या ? अभी अदिति गुप्ता के 85 घंटे लगातार नाचने का सिलसिला ख़त्म हुआ ही है कि नौ साल की सिमरन भारती 61 गीतों पर डांस करने की बात कह रही है और ग्यारवीं कक्षा के छात्र धीरज सेन 91 घंटे के लिए नाच रहे हैं.