http://www.bbcchindi.com

बुधवार, 27 दिसंबर, 2006 को 10:45 GMT तक के समाचार

नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर

सुबह रोज़ाना मुफ़्त मिलती है चाय....

भारत के राज्य राजस्थान की राजधानी जयपुर में चाय की एक ऐसी दुकान है जहाँ पर सुबह प्रतिदिन ग़रीबों और भिखारियों को चाय मुफ़्त में मिलती है.

इस चाय की दुकान के बाहर रोज़ाना सैकड़ों भिखारी चाय के लिए लाइनें लगाते हैं. उन्हें चाय के साथ ब्रेड भी दी जाती है.

कोई 40 साल पहले गुलाब सिंह धारीवाल ने सवेरे की पहली चाय ज़रूरतमंदों को देने का सिलसिला शुरू किया था और आज भी वह बदस्तूर जारी है.

पौस माह में कोहरे से लिपटी जयपुर की एक सुबह जब हम इस दुकान पर पहुँचे तो एक-एक कर भिखारी भी वहाँ जुटने लगे और देखते ही देखते भिखारियों की भीड़ इकट्ठा हो गई.

भिखारियों ने भी प्रतिदिन की तरह अपने अनुशासन का अभ्यास दोहराया और लाइन बनाकर अपने बर्तनों के साथ बैठ गए.

जयपुर की व्यस्त मिर्ज़ा इस्माइल रोड की इस दुकान पर सुबह की चाय का ज़ायका लेने भिखारी दूर-दूर से पहुँचे थे.

धारीवाल ने उन्हें पहले डबल रोटी बाँटी और फिर अपने चिर परिचितों को चाय वितरित की.

82 साल के धारीवाल कहते हैं, "जाड़े में सबेरे छह से सात बजे का समय चाय वितरण के लिए निर्धारित है. कोई इसमें चूक जाए तो वे पात्र देखकर बाद में भी चाय परोस देते हैं."

लगभग 200 भिखारी और ज़रुरतमंद हमारे सामने भी चाय की चुस्कियां लेने यहाँ पहुँचे थे.

पिछले कई वर्षों से सुबह की चाय पीने पहुँचते रहे मोहम्मद इस्माइल अब धारीवाल के इस परोपकार में कार्यकर्ता की तरह हाथ बँटाने लगे हैं.

इस्माइल ने कहा, "जब से होश संभाला है यहीं चाय पी रहा हूँ. चाय पीकर हमारे लिए उनके लिए ख़ूब दुआ निकलती है."

सुकून

गुलाब सिंह धारीवाल ने जब यहाँ चाय की दुकान शुरू की थी तो एक प्याला चाय की कीमत दो नए पैसे थी. आज वो एक प्याला चाय पाँच रुपए में बेचते हैं.

धारीवाल ने कहा, "मुझे इस काम से बहुत सुकून मिलता है. खर्च का हिसाब नहीं लगाता, क्योंकि ऐसा काम हिसाब-किताब से नहीं किया जा सकता."

भिखारी करतार बाणा ने कहा, "यहाँ सबेरे की चाय की चाहत रखने वालों की संख्या घटती-बढ़ती रहती है. जब किसी मंदिर में भंडारा या भोजन मिलता है तो हम लोग वहाँ भी चले जाते हैं. पर यह हमारा सुबह का पक्का ठिकाना है."

दास बाबा यूँ तो गुजरात के हैं, लेकिन पिछले 12 साल से जयपुर में ही जमे हुए हैं. जयपुर को मंदिरों की संख्या के हिसाब से छोटी काशी कहा जाता है.

देवालयों और दानदाताओं के कारण भिखारी गुलाबी नगरी को अपने लिए मुफ़ीद मानते हैं. इनमें से अधिकाँश के कदम सुबह-सुबह चाय की दुकान की ओर बढ़ जाते हैं.

भिखारियों को तसल्ली रहती है कि एक ठिकाना ऐसा भी है जहाँ बिन माँगे उन्हें चाय की प्याली मिल जाती है.